बिन्दु-1

विभाग के संगठन एवं कार्य 


                        भारत के ग्रामीण अंचलो में सहकारी आन्दोलन का शुभारम्भ करते हुए सहकारिता के माध्यम से आसान शर्तो पर कर्ज दिलाने की व्यवस्था की अधिकारिक रूप से शुरूआत वर्ष 1904 में सहकारी ऋण समिति अधिनियम बनने से हुई, जो सहकारिता की दिशा मे पहला कदम था। इस अधिनियम के अन्र्तगत प्रारम्भ मे केवल दो प्रकार शहरी क्षेत्रो एवं ग्रामीण क्षेत्रो की समितियो का गठन किया गया। इस अधिनियम के पारित होते ही इसके प्राविधानो को उत्साह के साथ लागू करते हुए विभिन्न प्रान्तीय सरकारों द्वारा रजिस्ट्रार नियुक्त किये गये और सहकारिता के सम्बन्ध मे प्रभावी शैक्षिक कार्यक्रम चलाये गये, जिससे वर्षानुवर्ष सहकारी आन्दोलन में प्रगति स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होने लगी। इस अधिनियम मे आगे चलकर कुछ कमिया भी दृष्टिगोचर हुई, जिन्हें दूर करते हुए तथा सहकारिता के कार्यक्षेत्र में वृद्वि लाते हुए वर्ष 1912 मे नया सहकारी अधिनियम बनाया गया। इस अधिनियम मे शहरी और ग्रामीण क्षेत्रो में गठित की जाने वाली समिति के अन्तर को समाप्त कर दिया गया तथा सहकारिता आन्दोलन के प्रसार को समुचित संरक्षण मिल जाने से ऋण देने के अतिरिक्त अन्य उदेदश्यो के लिए भी सहकारी समितियो का गठन सम्भव हो सका। तत्पश्चात सहकारी आन्दोलन के बहुमुखी प्रसार को दृष्टिगत रखते हुए वर्ष 1965 में नया सहकारी अधिनियम लागू किया गया। इस अधिनियम की धारा 130 के अन्र्तगत प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए राज्य सरकार द्वारा उ0प्र0 सहकारी समिति नियमावली 1968 अधिसूचित की गई। वर्तमान मे इसी अधिनियम एवं नियमावली के अधीन समस्त सहकारी समितिया अपने कार्यो का निष्पादन कर रही है।
                  सहकारिता विभाग के संगठन का दृष्टिकोण न केवल कृषको को सस्ते ऋण की सुविधा उपलब्ध करना है, वरन प्रदेश के विभिन्न अंचलो में ग्रामीण तथा शहरी जनता के निर्बल और निर्धन वर्ग को समृद्वशाली बनातें हुए उनके स्तर को ऊचा उठाना है। इन उदेदश्यो की पूर्ति हेतु सहकारिता विभाग द्वारा विभिन्न योजनाओं जैसे क्रय-विक्रय, शीतगृह, श्रम, उपभोक्ता, सहकारी ऋण एवं अधिकोषण आदि कार्यान्वित कर सहकारी समितियों को आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी जा रही हैं
               यह विभाग समितियों के लिए एक मित्र, विचारक एवं पथ प्रदर्शक के रूप में कार्य करता है तथा उनके कार्यो में आवश्यक निर्देश देता है तथा पर्यवेक्षण करता है। सहकारी समितिया सस्ते ऋण की सुविधा उपलबध कराने एवं निर्बल वर्ग के लोगो को समितियों की अंशपूजी में विनियोजन हेतु ऋण देने के अतिरिक्त कृषकों द्वारा उत्पादित वस्तुओं के विधायन एवं संग्रहण में सहायता करती है और क्रय-विक्रय की व्यवस्था कर उत्पादकों को उनकी उपज का अच्छा मूल्य दिलाने में भी सहयोग प्रदान करती है। यह समितिया किसानो को कृषि कार्य के प्रयोग मे आने वाले विभिन्न प्रकार के कृषि निवेशो को उन्हे उचित मूल्य पर उपलब्ध कराती है तथा ग्रामीण/नगरीय क्षेत्रो मे सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अन्तर्गत सहकारी समितियों के माध्यम से उपभोक्ताओ को कम मूल्य में दैनिक आवश्यकताओं की उपभोक्ता वस्तुओं के वितरण का कार्य भी किया जा रहा है। प्रारम्भिक कृषि समितिया, ऋण समितिया जिनकी संख्या वर्तमान मे लगभग 7479 है को बहुउददेशीय रूवरूप प्रदान किये जाने हेतु प्रत्येक समिति पर एक दुकान एवं कार्यालय की व्यवस्था है तथा कुछ समितियों मे सचिवो हेतु आवासीय सुविधा भी दी गयी है।
सहकारी समितियों में कार्यरत कर्मचारियों की प्रशासनिक क्षमता बढ़ाने हेतु सहकारी पर्यवेक्षको, प्रारम्भिक कृषि ऋण समितियों मे कार्यरत सचिवों एवं जिला सहकारी बैको के सचिवों आदि के प्रशिक्षण की व्यवस्था भी विभाग द्वारा की जा रही है। आलू उत्पादको को निजी व्यवसायों के शोषण से बचाने हेतु विभाग मे उत्तर प्रदेश आलू विकास विपणन सहकारी संघ लि0 का गठन किया गया हैं।
प्रदेश के समस्त आबादी मे लगभग 17 प्रतिशत अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोग है, जिनके पास इतने साधन उपलब्ध नही है कि वे सहकारी ऋण संस्थाओ के सदस्य बनकर प्राप्त होने वाली आर्थिक सहायता से अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ कर सके। अतः इस वर्ग के लोगो को सहकारिता के परिधि मे लाकर उनका सामाजिक स्तर ऊचा उठाने हुत कम्पांेनन्ट प्लान योजना के अन्र्तगत विभाग द्वारा अल्पकालीन ऋण/अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा है।
सहकारिता विभाग के अन्र्तगत कार्यरत समस्त अधिकारियो/कर्मचारियों का वेतन विभागीय अनुदान संख्या-18 कृषि तथा अन्य सम्बद्व विभाग सहकारिता के अन्र्तगत भुगतान किया जाता है। प्रदेश मे सचांलित विभागीय योजनाओ हेतु अनुदान संख्या-18 कृषि तथा अन्य सम्बद्व विभाग(सहकारिता) के अन्तर्गत तथा स्पेशल कम्पोनेन्ट प्लान से सम्बन्धित योजनाओ हेतु आय-व्ययक प्राविधान समाज कल्याण विभाग की अनुदान संख्या 83 के अन्र्तगत उपलब्ध होता है।
सहकारी संस्थाओ मे कर्मचारियो का चयन, अनुशासनिक नियत्रंण एवं सेवा नियमों के अनुमोदन आदि कार्य हेतु वर्ष 1972 से उत्तर प्रदेश सहकारी संस्थागत सेवामण्डल गठित हैं
सहकारी समितियों मे धन के अपहरण के मामले की शीघ्र जंाच एवं निस्तारण करने हेतु सहकारिता विभाग के अन्र्तगत संगठित विशेष अनुसंधान शाखा द्वारा प्राथमिकता पर दोषी व्यक्तियों के विरूद्व कठोर कार्यवाही की जाती हैं
सहकारी समितियों के लेखों के सम्प्रेक्षण एवं उनके रख रखाव के समबन्ध में उचित मार्गदर्शन का कार्य मुख्य लेखा परीक्षा अधिकारी, सहकारी समितिया एवं पंचायते उत्तर प्रदेश द्वारा सम्पादित किया जाता है जो सम्प्रेक्षण के उपरान्त धन के अपहरण गबन आदि गम्भीर मामलों को निबन्धक एवं समिति पदाधिकारियों को आवश्यक कार्यवाही हेतु सूचित करते हैं।
सहकारी क्षेत्र के अन्तर्गत उ0प्र0 सहकारी न्यायाधिकरण का गठन भी 1971 में किया जा चुका है।


विभाग का प्रशासनिक ढाचा:-


1.मुख्यालय में आयुक्त एवं निबन्धक/अपर आयुक्त एवं  अपर निबन्धक/वित्त नियंत्रक/मुख्य तकनीकी अधिकारी /वित्तीय सलाहकारी/उप आयुक्त एवं उप निबन्धक/सहायक आयुक्त एवं सहायक निबन्धक/अभियन्ता/लेखाधिकारी आदि नियुक्त है।
2. मण्डल मे प्रथम श्रेणी अधिकारी यथा स्थिति उप आयुक्त एवं उप निबन्धक नियुक्त हैं।
3. प्रत्येक मण्डल में एक-एक सहायक आयुक्त एवं सहायक निबन्धक उपभोक्ता नियुक्त हैं
4. मण्डलो में वित्त एवं लेखाधिकारी/लेखाकार नियुक्त हैं
5. प्रत्येक मण्डल मे एक-एक जिला सहायक आयुक्त एवं सहायक निबन्धक/कुछ जिलो मे जिला सहायक आयुक्त एवं सहायक निबन्धक के सहायतार्थ एक अतिरिक्त जिला सहायक आयुक्त एवं सहायक निबन्धक नियुक्त हैं
6. कृषि योजना के अन्तर्गत लखनऊ, रामपुर एवं वाराणसी जिलों मे सहायक आयुक्त एवं सहायक निबन्धक कृषि नियुक्त है।
7. प्रत्येक तहसील में एक अपर जिला सहकारी अधिकारी/सहकारी निरीक्षक वर्ग-1 नियुक्त है।
8. प्रत्येक विकास खण्ड में एक सहायक विकास अधिकारी (सह0)/सहकारी निरीक्षक वर्ग-2 कार्यरत है।
9. उपर्युक्त के अतिरिक्त तृतीय व चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी नियुक्त है।


निबन्धक (उ0प्र0 सहकारी अधिनियम-1965 की धारा-3(1) के अन्तर्गत नियुक्त)
मुख्यालय स्तर पर


1. अपर आयुक्त एवं  अपर निबन्घक
2. वित्त नियत्रंक
3. मुख्य तकनीकी अधिकारी
4. वित्तीय सलाहकार
5. उप आयुक्त एवं उप निबन्धक/योजनाधिकारी
6. सहायक आयुक्त एवं सहायक निबन्धक
7. वरिष्ठ परिलेख अधिकारी
8. लेखाधिकारी
9. शोध अधिकारी


मण्डल स्तर पर -


1. क्षे़त्रीय उप आयुक्त एवं उप निबन्धक
2. क्षेत्रीय सहायक आयुक्त एवं सहायक निबन्धक निबन्धक(कृषि, उपभोक्ता)
3. वित्त एवं लेखाधिकारी/लेखाकार


जनपद स्तर पर -


सहायक आयुक्त एवं सहायक निबन्धक निबन्धक


तहसील स्तर पर -


सहकारी निरीक्षक वर्ग-1
विकास खण्ड स्तर पर -
सहकारी निरीक्षक वर्ग-2


नोट:- उक्त के अतिरिक्त अन्य अधीनस्थ स्टाफ(लेखावर्ग, लिपिक वर्ग, पर्यवेक्षक एवं सहयोगी भी कार्यरत है)