2[29क. प्रारम्भिक कृषि ऋण समितियों, केन्द्रीय सहकारी बैंकों एवं शीर्ष बैंक के लिए विशेष उपबन्ध- इस अधिनियम, नियमावली एवं समिति की उपविधियों में किसी बात के प्रतिकूल होते हुए भी किसी प्रारम्भिक कृषि ऋण समिति या किसी केन्द्रीय सहकारी बैंक अथवा किसी शीर्ष बैंक की प्रबन्ध कमेटी ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का निष्पादन करेगी जो इस अधिनियम के अधीन उसके कार्यकलापों के क्रियान्वयन के प्रयाजनार्थ आवश्यक और समीचीन हो जिसमें निम्नलिखित सम्मिलित होंगे -
(क) निम्नलिखित के लिये शक्तिय-
(एक) सदस्य बनाने और अंशों से सम्बन्धित आवेदनों का निस्तारण करने के लिये।
(दो) संगठनात्मक उददेश्यों की व्याख्या करने एवं उन उददेश्यों को प्राप्त किये जाने हेतु विनिर्दिष्ट लक्ष्य निर्धारित करने के लिये।
(तीन) वार्षिक एवं अनुपूरक बजट तैयार करने एवं उनका सामान्य निकाय से अनुमोदन प्राप्त करने के लिये।
(चार) उपविधियों के अनुसार निधियों की वृद्धि करना एवं उनका विनिधान करने के लिये।
(पांच) निर्धारित स्तर से अधिक समस्त व्ययों और आगामी वर्ष/वर्षों के लिये पूंजी  विकास योजना को मंजूर करने के लिये।
(छः) समिति की किसी ऋण या मांग को प्रवर्तित करने और समिति के पक्ष या विपक्ष में विधिक कार्यवाही को संस्थित करने, प्रतिवाद करने या समझौता करने के लिए।
(सात) ऐसे परिवर्तनों, जो अपेक्षित संशोधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए किये गये हों, के संदर्भ में विधमान जनशक्ति संसाधनों और भावी अपेक्षाओं को अनुमान करने और प्रत्येक वर्ष के प्रारम्भ पर कम से कम एक बार जनशक्ति योजना की प्रक्रिया या उसकी प्रगति में कठिनाईयों पर विचार करने एवं उनका निराकरण करने के लिए।
(आठ) इस अधिनियम, नियमावली एवं उपविधियों के उपबन्धों अध्यधीन समिति का कार्य संचालन करने हेतु अधिकारियों एवं अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति करने एवं अन्य बातों के साथ साथ उनके कर्तव्यों, सेवा शर्तों, अवकाश सुविधाओं एवं अनुशासनिक मामलों को परिभाषित करने के लिए।
(नौ) सदस्यों एवं कर्मचारियों के लिए शिक्षा एवं प्रशिक्षण की व्यवस्था करने एवं उससे संबंधित कार्यक्रमों और प्रगति की समीक्षा प्रत्येक वर्ष के प्रारम्भ में कम से कम एक बार करने के लिए।
(दस) ऋण के आवेदनों का निस्तारण करने, रिजर्व बैंक एवं राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक के निर्देशों के अधीन रहते हुए ब्याज दर निर्धारित करने एवं ऐसे ऋणों के लिए प्रतिभूति अवधारित करने के लिए।
(ग्यारह) ऐसी उप कमेटियों, जिन्हें आवश्यक समझा जाय, की नियुक्ति करने के लिए।
(बारह) उसके कार्य संचालन का सामयिक मूल्यांकन करने के लिए।
(तेरह) विहित से सम्पत्तियों का अर्जन करने, धारित करने एवं निस्तारित करने के लिए।
(चौदह) रिजर्व बैंक द्वारा विनियमित किसी वित्तीय संस्था से ऋण प्राप्त करने एवं राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक अथवा किसी अन्य पुर्नवित्त पोषित करने वाले अभिकरण से सीधे अथवा भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विनियमित किसी वित्तीय संस्था के माध्यम से न कि आवश्यक रूप से केवल उस परिसंघीय श्रेणी से जिससे कि वह सम्बद्ध हो पुर्नवित्त पोषित करने के लिए और उसी प्रकार से किसी विनियमित वित्तीय संस्था में न कि आवश्यक रूप से केवल उस परिसंघीय श्रेणी में जिससे वह सम्बद्ध हो, उसके निक्षेपों को रखने या विनिधान करने के लिए।
(पन्द्रह) किसी परिसंघीय संरचना की सम्बद्धता और असम्बद्धता से संबंधित मुददों जिसमें किसी स्तर पर प्रवेश और निकास सम्मिलित है, का विनिश्चित करने के लिये।
(सौलह) व्यवसाय की अपेक्षा के अनुसार अपने कार्य संचालन क्षेत्र का विनिश्चित करने के लिए।
(सत्रह) ऐसे अन्य उपाय करने या ऐसे अन्य कार्य करने के लिए जो इस अधिनियम या नियमावली या उपविधियों के अधीन विहित किये जायें या अपेक्षित हों, और
(ख) निम्नलिखित कर्तव्य होंगे -
(एक) इस अधिनियम, नियमावली एवं उपविधियों के अधीन समस्त मामलों में सम्प्रेक्षण करने।
(दो) निम्नलिखित कार्य करने - (क) समिति के धन की समुचित रसीद व वितरण और समिति के लेखों, आस्तियों एवं दायित्वों का रख-रखाव,
(ख) समिति के प्रत्येक वर्ष की वार्षिक रिपोर्ट को तैयार करना,
(ग) निबन्धक द्वारा विहित सभी वार्षिक विवरणी को तैयार करना,
(घ) लेखा परीक्षा के लिए अपेक्षित लेखा के विवरण तैयार करना और उसे लेखा परीक्षकों के समक्ष रखा जाना,
(ड़) अन्य सभी विवरण और विवरणीयों को तैयार करना और उन्हें निबन्धक को प्रस्तुत करना।
(च) नियमित रूप से समिति के लेखों का समुचित लेखा पुस्तिकाओं में अनुरक्षण,
(छ) सदस्यों की पूजी का अद्यावदिक अनुरक्षण,
(तीन) इस अधिनियम और नियमावली के उपबन्धों के अधीन वितरण योग्य घोषित शुद्ध लाभों को विनियोग हेतु राष्ट्रीय बैंक के दिशा-निर्देशों, यदि कोई हो, के अनुसार संस्तुति करने और उसे सामान्य निकाय के समक्ष प्रस्तुत करने,
(चार) इस अधिनियम के अधीन निरीक्षण, जच और लेखा परीक्षा की सुविधा प्रदान करने और संबंधित प्राधिकारी से प्राप्त लेखा-परीक्षा, निरीक्षण और जच रिपोर्ट पर विचार करने और इस अधिनियम और नियमावली के उपबन्धों के अनुसार तत्संबंध में अनुपालन प्रस्तुत करने,
(पांच) सामान्य निकाय की बैठकें और विशेष बैठकें समय से आयोजित करने,
(छः) यह देखने कि ऋण और अग्रिम उन परियोजनों के लिए प्रर्युक्त किये जाते हैं जिनके लिए वे तात्पर्यित हैं और यह भी कि उनका प्रतिसंदाय नियमित रूप से किया जा रहा है,
(सात) ऋणों एवं अग्रिमों के प्रतिसंदाय में समस्त बकायों और व्यतिक्रमों के मामलों में परीक्षण करने एवं तुरन्त कार्यवाही करने,
(आठ) समिति के सभी मामलों में सदस्य से सम्पर्क बनाये रखने एवं सहकारी सिद्धान्तों का अनुपालन सुनिश्चित करने।
(नौ) समय से निर्वाचन कराने की व्यवस्था करने, और
(दस) ऐसे अन्य कृत्यों का निष्पादन करना जो उसे सामान्य निकाय द्वारा प्रस्तुत किये जाय या इस अधिनियम, नियमावली और उपविधियों द्वारा या तदधीन अपेक्षित हों,
(ग)-
(एक) प्रबन्ध कमेटी का कोई सदस्य कमेटी में बने रहने के लिए अनर्ह हो जायेगा यदि वह किसी केन्द्रीय सहकारी या शीर्ष बैंक के बोर्ड में किसी गैर ऋण समिति का प्रतिनिधित्व कर रहा हो और ऐसी समिति ने 90 दिन से अधिक की अवधि तक व्यक्तिक्रम किया हो।
(दो) ऐसा व्यक्ति जो व्यक्तिक्रम सदस्य हो या किसी व्यक्तिक्रमी प्रारम्भिक कृषि ऋण समिति का पदाधिकारी हो यथास्थिति समिति अथवा बैंक के बोर्ड के लिए निर्वाचित किये जाने हेतु अर्ह नहीं होगा अथवा एक वर्ष से अधिक समय के लिए बोर्ड में नहीं बना रह सकेगा जब तक कि व्यक्तिक्रम समाप्त न हो जाए।
(घ) प्रारम्भिक कृषि सहकारी ऋण समिति राष्ट्रीय बैंक के परामर्श से निबन्धक द्वारा यथाविहित वित्तीय मानदण्डों के सम्बन्ध में समस्त निर्देशों का पालन करेगी।

1. उ0 प्र0 अधिनियम सं0 47 सन् 2007 द्वारा उपधारा (8) बढायी गयी जो उ0 प्र0 असाधारण गजट भाग-1 खण्ड (क) दिनांक 10 दिसम्बर, 2007 को प्रकाशित हुआ।
2. उ0 प्र0 अधिनियम सं0 47 सन् 2007 द्वारा धारा 29-क बढाई गई जो उ0 प्र0 असाधारण गजट भाग-1 खण्ड (क) दिनांक 10 दिसम्बर, 2007 को प्रकाशित हुआ।