धारा-38. सहकारी समिति के अधिकारी को हटाया जाना-(1) यदि निबन्धक की राय में सहकारी समिति के किसी अधिकारी ने इस अधिनियम, नियमों या समिति की उपविधियों के किन्हीं उपबन्धों का उल्लंघन किया है, या उसका पालन नहीं किया है, या पद धारण करने का अपना अधिकार खो दिया है, तो निबन्धक किसी ऐसी अन्य कार्यवाही पर जो उसके विरूद्ध की जाये या की जा सकती हो, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना समिति से ऐसे अधिकारी को निर्दिष्ट अवधि के भीतर, उसके पद से हटाये जाने के लिए और यदि आवश्यक हो तो उसे उक्त समिति के अधीन तीन वर्ष से अनधिक अवधि के लिए कोई पद धारण करने के लिए अनहित भी करने के लिए कह सकता है, जिसके उपरान्त समिति सम्बद्ध अधिकारी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् ऐसे आदेश दे सकती है जो वह उचित समझे।
1[प्रतिबन्ध यह है कि रिजर्व बैंक के अनुरोध पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा केन्द्रीय सहकारी बैंक या उत्तर प्रदेश सहकारी बैंक के ऐसे निदेशक या सचिव/ मुख्य कार्यापालक अधिकारी को सुनवाई का अवसर देने के उपरान्त हटा दिया जायेगा जो रिजर्व बैंक के निर्धारित मानदण्ड को पूरा नहीं करत हैं।
(2) उपधारा (1) के अधीन समिति द्वारा कार्यवाही न करने पर, निबन्धक उक्त अधिकारी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् और ऐसे कारणों से जो अभिलिखित किये जायेंगे तथा जिनकी संसूचना सम्बद्ध अधिकारी तथा समिति को दी जायेगी हटा सकती है, या हटाने के साथ-साथ उसे तीन वर्ष से अनधिक अवधि के लिए उक्त समिति के अधीन कोई पद धारण करने से अनर्हित कर सकता है।

(3) उपधारा (1) तथा उपधारा (2) के अधीन हटाया गया कोई अधिकारी आदेश की प्राप्ति के दिनांक के उस पर पद न रहेगा और यदि उसे अर्नहित कर दिया गया हो तो वह आदेश में निर्दिष्ट अवधि के लिए उक्त समिति के अधीन कोई पद धारण करने का पात्र न होगा।


टिप्पणिय


निबन्धक को प्रदत्त पर्यवेक्षणीय अधिकारों, सचिव को प्रदत्त कार्यपालिका शक्तियों तथा केन्द्रीयित सेवा के निर्माण का एकमात्र उददेश्य यही है कि सहकारी समितियों का कार्य संचालन भली-भांति हो सके। केन्द्रीय सेवा का गठन किंचित इसलिए किया गया है कि कर्मचारी किसी स्थान विशेष में स्थित किसी सहकारी समिति में अपना कोई हित अर्जित न कर ले। यद्यपि सचिव को विस्तृत शक्तिय प्रदत्त हैं, किन्तु वह भी अध्यक्ष तथा प्रबन्ध समिति के नियन्त्रणाधीन होते हैं। अतः यह नहीं माना जा सकता कि सहकारी समिति अधिनियम कोई कानून इसलिए नहीं है कि सहकारी समितियों के निबन्धक एवं सचिवों को विस्तृत शक्तिय  प्रदान की गयी हैं और एक केन्द्रीयित सेवा का गठन किया गया है।
धारा 38 में सभापति सहित सहकारी समिति के किसी अधिकारी के अपदस्थ किये जाने का विशिष्ट प्राविधान है। इसलिए पद प्रबन्ध कमेटी जिसका प्रयोग धारा 35 में किया गया है, में सभापति सम्मिलित नहीं है और इस धारा के अधीन सहकारी समिति के सभापति के विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती।
धारा 38 के अधीन किसी पद धारक को हटाया जाना एक दांडिक कार्यवाही (Penal Action) है। इसके विपरीत, किसी पद-धारक का अविश्वास के प्रस्ताव द्वारा हटाया जाना पदधारक की किसी त्रुटि के कारण नहीं होता, बल्कि यह केवल इस बात का द्योतक होता है कि निर्वाचन मण्डल का उसमें विश्वास समाप्त हो गया है। दोनों उपबन्ध भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में कार्य करते हैं और एक दूसरे के विरोध में नहीं हैं।
--------------------------------------
1. उ0 प्र0 अधिनियम संख्या 47 सन् 2007 द्वारा प्रतिबन्धात्मक खण्ड बढाया गया जो उ0 प्र0 असाधारण गजट भाग-1 खण्ड(क) दिनांक 10 दिसम्बर, 2007 को प्रकाशित हुआ।