धारा-79. निबन्धन के परिणाम.- (1) जब कोई सहकारी कृषि समिति धारा 77 के अधीन निबन्धित हो तो मण्डल की उस समस्त भूमि के संबंध में जिसे कोई सदस्य चाहे भूमिधर के रूप में या सीरदार के रूप में धारण किये हो सिवाये उसके आसामी के कब्जे की भूमि के और वह भी उस समय तक जब तक वह आसामी उसे इस प्रकार धारण किये रहे, यह समझा जायेगा कि वह सहकारी कृषि समिति के कब्जे, नियन्त्रण तथा प्रबन्ध में चली गयी है और तदुपरान्त वह समिति उस भूमि को इस अध्याय के उपबन्धों के अनुसार धारित करेगा और धारा 77 की उपधारा (1) में उल्लिखित किन्हीं भी प्रयोजनों के लिए उसका उपयोग कर सकती हैः
प्रतिबन्ध यह है कि इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसी भूमि पर लागू न होगी जिस पर प्रक्षेत्र गृह (Farm house) बनाया गया हो और न प्रक्षेत्र गृह से संलग्न ऐसी भूमि पर लागू होगी जिसका क्षेत्रफल आधे एकड़ से अधिक न हो और जिसे सदस्य समिति की सदस्यता के लिए प्रार्थना-पत्र देते समय, अपनी निजी जोत के लिए सुरक्षित रखने की इच्छा प्रकट करे।
प्रतिबन्ध यह है कि यदि सहकारी कृषि समिति के सदस्य का संयुक्त जोत में केवल अंश हो तो उक्त जोत में उसके अंश के संबंध में जब तक कि उक्त जोत के समस्त सहांशी (Co- sharer) ऐसी समिति के सदस्य न हों, यह नहीं समझा जायेगा कि वह समिति के कब्जे, नियंत्रण तथा प्रबन्ध में चला गया है जब तक कि वह अपने अंश का बटवारा न करा ले अथवा जब तक कि उक्त जोत के भाग पर उसका पृथक कब्जा न हो जायेः
प्रतिबन्ध यह भी है कि इस धारा में दी गयी किसी बात से यह अर्थ नहीं लगाया जायेगा कि किसी भूमिधर या सीरदार का उस भूमि में जो उसने सहकारी कृषि समिति को अंशदार के रूप में दी हो हित, धारा 82 में की गयी व्यवस्था को छोड़कर निहित नहीं रह गया है।
स्पष्टीकरण-(1) इस धारा के प्रयोजनों के लिए भूमि के अन्तर्गत बाग भूमि, अथवा वह भूमि न होगी जो किसी भूमिधर या सीरदार द्वारा धारित हो तथा जिसका उपयोग उद्यानकरण, रेशम के कीड़ पालने अथवा पशुपालन, जिनके अन्तर्गत सूअरपालन, मत्स्य संर्वद्धन तथा कुटकुट पालन भी है, सम्बन्धित किन्हीं भी प्रयोजनों के लिए अथवा ऐसे प्रयोजनों में सहायक किसी कुटीर उद्योग के विकास के लिए किया जाता हो, किन्तु इसके अन्तर्गत ऐसी भूमि होगी जिसे भूमिधर अथवा सीरदार पूर्वोक्त प्रयोजनों में से किसी के लिए भी धारण किया हो, यदि यह प्रयोजन समिति के प्रयोजनों में से भी एक हो।
(2) सहकारी कृषि समिति का कोई सदस्य, सिवाय उस दशा के जिसकी व्यवस्था उपधारा (3) में दी गयी है, अपने द्वारा समिति को अंशदान के रूप में दी गई भूमि का कोई निस्तारण (disposition) करने का हकादार न होगा।
(3) सहकारी कृषि समिति का प्रत्येक सदस्य जो उस सहकारी कृषि समिति को अपने द्वारा अंशदान के रूप में दी गई भूमि का भूमिर हो 1950 ई0 के उत्तर प्रदेश जमींदार विनाश और भूमि-व्यवस्था अधिनियम की धारा 169 में दिये गये उपबन्धों के अधीन रहते हुए ऐसी भूमि का वसीयत द्वारा निस्तारण कर सकता है तथा सहकारी कृषि समिति की अनुज्ञा से उसका अन्य प्रकार से भी निस्तारण कर सकता है।
(4) सहकारी कृषि समिति का प्रत्येक सदस्य ऐसे अधिकारों या विशेषाधिकारों का हकदार होगा, ऐसे आभारों तथा दायित्वों के अधीन रहेगा और ऐसे कर्तव्यों का पालन करने के लिए बाध्य होगा जो इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन दिये जायें या उस पर आरोपित किये जायें।
(5) सहकारी कृषि समिति के निबन्धित हो जाने के दिनांक से उपधारा (1) के अधीन समिति द्वारा धारित भूमि के संबंध में, समिति के किसी सदस्य द्वारा देय समस्त अबवाब, स्थानीय कर, लगान या मालगुजारी, (उससे समिति से) वसूल किये जा सकते हैं;समिति द्वारा सदस्य की ओर इस प्रकार भुगतान की गई किसी धनराशि की वसूली वह उक्त सदस्य से करेगी।
(6) 1950 ई0 के जमींदारी विनाश और भूमि-व्यवस्थाच अधिनियम (1951 ई0 का उत्तर प्रदेश अधिनियम सं0 1) के उपबन्ध, जह तक वे इन अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हों, भूमि तथा उसके धारक (holder) पर प्रवृत रहेंगे।


टिप्पणी


यह स्पष्ट ही है कि सहकारी समिति को एक बार भूमि का अंशदान (Contribute) कर दिये जाने पर वह भूमि सहकारी समिति की हो जायेगी और जब सहकारी समिति अनुमति न दे किसी भी सदस्य द्वारा उसको वापस नहीं लिया जा सकता। इस धारा में यह उपबन्ध अवश्य है कि कोई सदस्य अपने स्थान पर बनने वाले किसी अन्य सदस्य को ऐसे अंश का अन्तरण कर सकता है, किन्तु किसी भी अवस्था में भूमि को अपने कब्जे में वापस नहीं ले सकता। इस प्रकार की स्थिति उत्तर प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम, 1965 के प्रवर्तन में आने से पूर्व की ही होगी। हा ; 1965 के अधिनियम के प्रवर्तन में आने के पश्चात् की स्थिति भिन्न होगी।