धारा-88. नियम बनाने का अधिकार.- (1) धारा 130 के अधीन बनाये गये नियमों के अतिरिक्त राज्य सरकार इस अध्याय के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के प्रयोजनों के लिये नियम बना सकती है।
(2) पूर्वोक्त अधिकार की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित की व्यवस्था की जा सकती है-
(क) ऐसे आधार, जिस पर सहकारी कृषि समिति किसी भूमिधर सदस्य को धारा 79 के अधीन उसकी भूमि का निस्तारण (Dispotion) करने की अनुज्ञा कर सकती है,
(ख) वे सिद्धान्त जिन पर तथा वह रीति जिसके अनुसार धारा 82 के अधीन व्यय तथा प्रतिकर का अवधारण किया जायेगा या उसकी प्रतिपूर्ति की जायेगी अथवा उसका भुगतान किया जायेगा,
(ग) वे प्रपत्र जिनमें धारा 84 के अधीन प्रार्थना-पत्र तथा अपीलें प्रस्तुत की जायेंगी और प्रार्थना पत्र तथा अपील के ज्ञापन-पत्र पर दिये जाने वाले न्यायालय शुल्क, यदि कोई हो, की धनराशि,
(घ) वे सिद्धान्त तथा प्रक्रिया जिनका, अनुसरण धारा 84 के अधीन जोतों की चकबन्दी करने, भूमि के विनिमय (Exchange) का निर्देश देने और प्रतिकर का भुगतान करने में किया जायेगा,
(ड़) बहिर्गामी अथवा भूतपूर्व सदस्य की भूमि निधियों, कृषि के काम आने वाले पशुओं ओर उपकरणों (emplement) के विषयों में दावों को चुकता करना, जिनका अंशदान उसने सहकारी कृषि समिति को किया है;
(च) सदस्यों द्वारा भूमि से भिन्न सम्पत्ति का अंशदान तथा उसका मूल्यांकन और समायोजन (Adjustment);
(छ) सहकारी कृषि समिति के फार्म पर काम करने वाले सदस्यों को दिये जाने वाले पारिश्रमिक को निर्धारित करने के सिद्धान्त;
(ज) कोई अन्य विषय जो इस अध्याय के अधीन नियम किये जाने हों तथा नियत किये जा सकें।