धारा-91. प्रभार का प्रवर्तन.- अध्याय 9 में अथवा ततसमय प्रचलित किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी परन्तु इस अधिनियम के व्यवस्थित वसूली की किसी अन्य रीति पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना निबन्धक अथवा उसके द्वारा तदर्थ प्राधिकृत उसका अधीनस्थ कोई राजपत्रित अधिकारी, सहकारी समिति के प्रार्थना-पत्र पर और ऋण अथवा शेष भाग के अस्तित्व के सम्बन्ध में समाधान हो जाने पर, आदेश दे सकता है कि किसी सदस्य अथवा भूतपूर्व अथवा मृत सदस्य द्वारा समिति को देय किसी भी ऋण अथवा शेष मग का भुगतान ऐसी सम्पत्ति को अथवा उसमें किसी ऐसे हित को जो धारा 39 के अन्तर्गत प्रभार के अधीन हो को बेच कर दिया जायेः
प्रतिबन्ध यह है कि इस धारा के अधीन तब तक कोई आदेश नहीं दिया जायेगा जब तक कि सदस्य, भूतपूर्व सदस्य अथवा मृत सदस्य के नाम निर्दिष्ट व्यक्ति, दायाद अथवा विधिक प्रतिनिधि पर प्रार्थना-पत्र का नोटिस तामील न कर दिया हो और उसने नोटिस तामील किये जाने के दिनांक से एक मास के भीतर ऋण अथवा शेष भाग का भुगतान न कर दिया हो।


टिप्पणिय


धारा 91 यह स्पष्ट करती है कि निबन्धक केवल वहीं किसी सदस्य की सम्पत्ति या उसमें निहित किसी हित का विक्रय करके किसी बकाया मग की वसूली का आदेश करने के लिये सशक्त होता है जह कि वह सम्पत्ति धारा 39 के अन्तर्गत किसी प्रभार के अधीन हो। किसी ऐसी सामग्री के सदर्शन के अभाव में किसी विक्रय की जाने वाली सम्पत्ति धारा 39 के अन्तर्गत किसी प्रभार के अधीन थी, धारा 91 के अधीन कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती।
धारा 91 के अधीन अधिकारिता का विस्तार- धारा 91 के अधीन किसी व्यक्ति के विरूद्ध देय समस्त धनराशि की वसूली उस व्यक्ति की सम्पत्ति के विक्रय द्वारा किये जाने का आदेश पारित करने के लिये सहायक निबन्धक पूर्णरूपेण सक्षम है।
उ0 प्र0 सहकारी समिति नियमावली, 1978 नियम 312 (ग) - उ0 प्र0 सहकारी समिति अधिनियम, 1965, धारा 91 तथा 92 (ख) - वसूली अधिकारी द्वारा नियम 312(ग) के अधीन म
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नयी धारा 90ग उ0 प्र0 अधिनियम संख्या 47 सन् 2007 द्वारा बढाई गई जो उ0 प्र0 असाधारण गजट भाग-1 खण्ड(क) दिनांक 10 दिसम्बर 2007 को प्रकाशित हुआ।
नोटिस निर्गत की गई- ऐसी नोटिस की विधिमान्यता- डिग्रीदार द्वारा इस बात का आवेदन किया गया कि अभिनिर्णय का निष्पादन धारा 91 से नहीं, अपितु यथापेक्षित द्वारा 92(ख) से प्रभावित है, क्योंकि अभिनिर्णय के निष्पादन की प्रार्थना केवल धारा 92(ख) के अधीन किये गये आवेदन-पत्र द्वारा ही की जा सकती थी- यह धारण किया गया कि प्रार्थना-पत्र में विधि के गलत उपबन्ध का उल्लेख करने मात्र से वह नोटिस जो अन्यथा विधिमान्य है, प्रदूषित नहीं हो जायेगा। राधा बल्लभ टंडन बनाम कोआपरेटिव ट्रब्यूनल, आदि। 1980 UPLBEC 254।