धारा-96. सहकारी न्यायाधिकरण-(1) राज्य सरकार, इस अध्याय के अधीन न्यायाधिकरण को प्रदान किये गये कृत्यों के सम्पादन के लिए न्यायाधिकरण या न्यायाधिकरणों का संगठन कर सकते हैं, जिसमें से प्रत्येक सहकारी न्यायाधिकरण कहलायेगा, और यदि एक से अधिक न्यायाधिकरण संगठित किये जायें, तो राज्य सरकार, लिखित आदेश द्वारा ऐसा क्षेत्र जिसके भीतर अथवा ऐसे मामलों का वर्ग जिसके ऊपर प्रत्येक न्यायाधिकरण, क्षेत्राधिकार या प्रयोग करेगा, निश्चित कर सकती है।
(2) न्यायाधिकरण में ऐसी अर्हतायें रखने वाले, जो नियत की जायें, 1{ * * *] तीन व्यक्ति होंगे।
(3) यदि न्यायाधिकरण में तीन सदस्य हों, तो उसके कार्य निस्तारण के लिये किन्हीं दो सदस्यों से गणपूर्ति होगीः
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि उनमें मतभेद होने की दशा में उस मामले को जिस पर मतभेद हो, तीसरे सदस्य के समक्ष रखा जायेगा और उस मामले पर जिस मत से वह सहमत होगा वही मत न्यायाधिकरण का मत समझा जायेगा। यदि किसी मामले की न्यायाधिकरण के सभी तीन सदस्यों द्वारा सुनवाई की जाये और मतभेद हो तो बहुमत अभिभावी होगा ;
(4) न्यायाधिकरण के किसी सदस्य का स्थान रिक्त होने पर उसकी पूर्ति राज्य सरकार करेगी।
(5) न्यायाधिकरण द्वारा बैठक बुलाने तथा कार्य-निस्तारण करने की प्रक्रिया वही होगी, जो नियत की जाये।
-----------------------------------------
1. उ0 प्र0 अधिनियम सं0 12, 1976 के द्वारा बनाये गये (3.10.1975 से प्रभावी)।
2. अधिनियम सं0 17, 1994 द्वारा बढाया गया।
3. शब्द एक या अधिनियम संख्या 17, 1994 द्वारा निकाला गया।