धारा-1[122क. कतिपय सेवाओं का केन्द्रीकरण-(1) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुये भी, राज्य सरकार ऐसी सहकारी समितियों या सहकारी समितियों के वर्ग के ऐसे कर्मचारियों की, जिसे राज्य सरकार उचित समझे ऐसी सहकारी समितियों के लिए सर्वमान्य एक या अधिक सेवाओं के सृजन के लिये नियमों द्वारा उपबन्ध कर सकती है और किसी ऐसी सेवा में भर्ती, नियुक्ति और उसमें नियुक्त व्यक्तियों को हटाने की प्रणाली और उनकी सेवा की अन्य शर्तो को नियत कर सकती है;
(2) जब कोई ऐसी सेवा सृजित की जाये, तब ऐसी सेवा में सम्मिलित पदों पर ऐसी सेवा से सृजन के दिनांक को ऐसी समितियों के सभी समितियों के सभी कर्मचारियों को ऐसी सेवा के सृजन के दिनांक से सेवा में अस्थायी रूप से आमेलित समझा जायेगाः
प्रतिबन्ध यह है कि कोई ऐसा कर्मचारी नियम अवधि के भीतर नियम प्राधिकारी को लिखित नोटिस द्वारा ऐसी सेवा का सदस्य न होने के अपने विकल्प की सूचना दे सकता है और उस दशा में समिति में उसकी सेवायें ऐसी नोटिस के दिनांक से समाप्त हो जायेगी और वह समिति से ऐसे प्रतिकर का हकदार होगा जो-

(क) किसी स्थायी कर्मचारी की दशा म, उसके तीन मास के या सेवा की शेष
अवधि के जो भी कम हो वेतन (जिसमें सभी भत्ते भी सम्मिलित है) के
बराबर होगा;
(ख) किसी अस्थायी कर्मचारी की दशा में, उसके एक मास के या सेवा की शेष अवधि के, जो भी कम हो, वेतन (जिमें सभी भत्ते भी सम्मिलित है) के बराबर होगा।
(3) उपधारा (2) के अधीन अस्थायी रूप से आमेलित कर्मचारी सेवा में अन्तिम रूप से आमेलित किया जा सकता है, यदि वह निबन्धक द्वारा जारी किये गये अनुदेशों के अनुसार अन्वीक्षण के पश्चात उपयुक्त पाया जाये और किसी ऐसे कर्मचारी की सेवायें जिसे सेवा में आमेलित के लिये उपयुक्त न पाया जाये, विहित प्राधिकारी द्वारा और जब तक ऐसा प्राधिकारी विहित न किया जाये निबन्धक के ऐसे अनुदेशों में इस निमित्त विनिर्दिष्ट अधिकारी द्वारा इस निमित्त आदेश जारी करने के दिनांक से समाप्त हो जायेगी, और वह उपधारा (2) के खण्ड (क) या (ख) में निर्धारित प्रतिकर का, स्थायी या अस्थायी कर्मचारी होने के अनुसार हकदार होगा।]




टिप्पणी



उ0प्र0 सरकारी समिति, अधिनियम, 1965 की धारा 122-क-भारत का संविधान, अनुसूची सात सूची दो, प्रविष्टि 32; सूची एक, प्रविष्टि 43 तथा 45-राज्य विधान मण्डल की अधिनियम को सहकारी बैंकों पर भी लागू करने की सक्षमता-यह धारण किया गया कि अधिनियम के सारांश को देखते हुये, उसका विधान किया जाना राज्य सरकार की सक्षमता के अन्तर्गत था वीरेन्द्र पाल सिंह आदि बनाम दि डिस्ट्रक्ट असिस्टेन्ट रजिस्ट्रार, कोआपरेटिव सोसाइटीज,एटा तथा एक अन्य, 1980UPLBEC 202,(उच्च न्यायालय, खण्डपीठ)

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1. उ0प्र0 अधिनियम सं0 17,1977 के द्वारा बदली गयी (3.10.1975 से प्रभावी)