धारा-125. सहकारी समितियों का समामेलन या विलयन का निदेश देने का निबन्धक का प्राधिकार-(1) यदि निबन्धक की यह राय हो कि दो या अधिक सहकारी समितियों का समामेलन या विलयन उनकी शक्ति या उपयोगिता बढ़ाने के लिए आवश्यक या वांछनीय हे तो वह, इस अधिनियम में किसी विपरीत बात के होते हुये भी, उस वित्त पोषण बैंक से, यदि कोई हो, परामर्श करने के पश्चात, जिसकी उक्त समितिय ऋणी है, ऐसी समितियों को एक ही समिति में ऐसे समय के भीतर जिसे वह निर्दिष्ट करे, समामेलित या विलीन होने का लिखित आदे दे सकता है और तदुपरान्त  समितिय  ऐसी समस्त कार्यवाहिय करेगी जो धारा 15 के उपबन्धों के अनुसार उस प्रयोजन के लिए आवश्यक हों।
(2) उपधारा (1) के अधीन दिये गये आदेश के अनुसार समितियों के समामेलन या विलीन होने पर निबन्धक 1[* * *] लिखित आदेश द्वारा समितियों को एक समिति में समामेलित या विलीन होने का निदेश दे सकता है।
(3) उपधारा (2) के अधीन निबन्धक का निदेश धारा 15 की उपधारा (2) तथा (3) के प्रयोजनों के लिए सम्बद्ध समितियों का प्रारम्भिक संकल्प समझा जायेगाऔर निबन्धक ऐसी अतिरिक्त कार्यवाहियॉ करेगा जो इस धारा के द्वारा अपेक्षित हों।
(4) 2[ धारा 15 की उपधारा (2) के खण्ड (क) के अधीन प्रारम्भिक संकल्प की प्रति प्राप्त होने के दिनांक से या, यथास्थिति, उक्त उपधारा के खण्ड (ख) के अधीन किसी समाचार पत्र में उसके प्रकान के दिनांक से तीस दिन, व्यतीत हो जाने के पश्चात निबन्धक सम्बद्व समितियों की निधियों से, धारा 41 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, समस्त सदस्यों की अंशपूजी का प्रतिदान करेगा, और ऐसे समस्त ऋणदाताओं के दावों को चुकता करेगा, जिन्होंने धारा 15 की उपधारा (3) के क्रमशः खण्ड (1) और (2) के अधीन नोटिस दिया हो और तदुपरान्त समितियों के यथास्थिति समामेलित या विलयन की घोषणा करेगा तथा समामेलन की दशा में इस प्रकार की बनी नयी समिति तथा उसकी उपविधियों को निबन्धित करेगा।
(5) उपधारा (4) के अधीन विलयन या नयी समिति के निबन्धक की घोषणा से धारा 15 के अधीन विलयन या निबन्धक समझा जायेगा और उस धारा की उपधारा (7) के उपबन्ध उस पर प्रवृत्त होगें।
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1.उ0प्र0 अधिनियम सं0 12,1976 के द्वारा निकाल दिये गये (3.10.1975 से प्रभावी)
2.उ0प्र0 अधिनियम सं0 12,1976 द्वारा रखे गये (3.10.1975 से प्रभावी)