धारा-1[125 . सहकारी चीनी मिलों के सम्बन्ध में विशेष प्राविधान-(1)इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध या उसके अधीन बनाये गये नियम या सम्बन्धित समिति के उपविधि या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुये भी जह ऐसी सहकारी चीनी मिल, जिसमें अधिकांश अंशपूंजी राज्य सरकार द्वारा घृत है, और राज्य सरकार का यह समाधान हो जाये कि न तो चीनी मिल सुव्यवस्थित व्यवसाय (साउण्ड बिजनेस) कर पर रही है और न ही ऐसा करने की सम्भावना है, वह ऐसी सहकारी चीनी मिल को किसी अन्य समिति, कम्पनी, फर्म या निकाय को अंतरित करने के लिये निबंधक को संस्तुत कर सकती ह र राज्य सरकार की संस्तुति प्राप्त होने पर निबंधक, वित्त पोषक बेंक या वित्त पोषक संस्था, यदि कोई हो, जिसकी वह चीनी मिल ऋणी हो, से परामर्श रने के पश्चात सम्बन्धित समिति को लिखित नोटिस द्वारा, जिसमें ऐसे विवरण उल्लिखित होंगे, जसे विहित किये जायें और ऐसे अवधि के भीतर जैसा नोटिस में विनिर्दिष्ट हो, उसकी आस्तियों या आस्तियों और दायित्वों का पूर्णतः या अंशतः किसी अन्य समि‍ति या कम्पनी या फर्म या निकाय, चाहे निगमित हो या न हो, ऐसे निबन्धन ओर शर्तो जैसी विहित रीति से निर्धारित किये जायें, को अंतरण की अपेक्षा करेगा और ऐसे अंतरण पर, ऐसी चीनी मिल के लिये इस अधिनियम के अधीन बनाई गई समिति भंग हो जायेगी।
(ख) यदि खण्ड (क) में निर्दिष्ट नोटिस में विनिर्दिष्ट समय के भीतर समिति, ‍िनबंधक द्वारा दिये गये निर्देशों का अनुपालन करने में असफल रहती है, तो वह ऐसी समिति की कमेटी तथा उसके ऋणदाताओं को गजट में अधिसूचित आदेश द्वारा प्रत्यावेदन, यदि कोई हो, प्रस्तुत करने के लिये विहित रीति से अवसर प्रदान करने के पश्चात खण्ड (क) में निर्दिष्ट रीति से समिति के पूर्णतः या अंशतः आस्तियों या आस्तियों ओर दायित्वों कं अंतरण के लिये निदेश जारी करने सहित मामले में ऐसी कार्यवाही कर सकता है, जैसी कि वह उचित समझे।
प्रतिबन्ध यह ह कि ऐसी मिल समितियों के मामले में, जह राज्य सरकार की 50 प्रतिशत से अधिक अंशपूजी है वह निबन्धक के लिये, उक्त खण्ड (क) एवं (ख) के उपबन्धों के अनुसार कार्यवाही हेतु समिति के सामान्य निकाय से प्रस्ताव पारित करना अनिवार्य नही होगा
(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिये राज्य सरकार नियम बनानें, और निबंधक को ऐसे निदेश जैसा वह उचित समझे, देने के लिये सक्षम होगी।
स्पष्टीकरण- इस धारा के प्रयोजन के लिये कम्पनी का तात्पर्य, कम्पनी अधिनियम, 1956 में यथा परिभाषित कम्पनी से है।