धारा-130. नियम बनाने का अधिकार-(1) राज्य सरकार 1[ * * * ] इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकती है।
(2) विशेषतया और उपधारा (1) के अधीन अधिकार की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इस धारा के अधीन बनाये जाने वाले नियमों में निम्नलिखित सभी या किसी विषय की व्याख्या की जा सकती है-
(1) प्रार्थी जिसको, र रीति जिसके अनुसार, सहकारी समिति को निबन्धित करने से इन्कार करने का आदेश निबन्धक द्वारा धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन सूचित किया जाये;
(2) विषय जिनके सम्बन्ध में सहकारी समिति उपविधिय बनायेगी या बना सकती है।
(3) सहकारी समिति के दायित्व के स्वरूप तथा मात्रा में परिवर्तन की प्रक्रिया तथा शर्ते;
(4) सहकारी समिति द्वारा उपविधियों के संशोधन के लिए अनुसरण की जाने वाली प्रकिया;
(5) प्रबन्ध कमेटियों का संगठन;
(6) सहकारी समिति की प्रबन्ध कमेटी की सामान्य बैठक के सभपति द्वारा द्वितीय निर्णायक मत दिये जाने की व्यवस्था;
(7) सहकारी समिति द्वारा, ऐसी दूसरी सहकारी समिति की बैठक मे, जिसकी वह सदस्य हो, उसका प्रतिनिधित्व करने तथा उसकी ओर समत देने के लिए एक या अधिक सदस्यों की नियुक्ति;
(8) साधारण सदस्यों के अधिकार और दायित्व तथा किसी ऐसी सहकारी समिति के जिसमें अन्य सहकारी समितिय भी उसकी सदस्य हो, सामान्य निकाय या प्रबन्ध कमेटी के संगठन में ऐसे सदस्यों का जो व्यक्ति विशेष हो ओर अन्य सदस्यों का अनुपात;
(9) यदि अंश एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा संयुक्त रूप से पारित हो तो मतदान करने का अधिकारी;
(10) किसी सदस्य द्वारा उस व्यक्ति को नाम निर्देश की प्रक्रिया जिसे ऐसे सदस्य की मृत्यु होने पर उसका अंश या हित संक्रमित किया जा सके या उसके मूल्य का भुगतान किया जा सकें;
(11) रीति जिसके अनुसार मृत या भूतपूर्व सदस्य के अंश का मूल्य निश्चित किया जायेगा और उसका भुगतान;
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1.उ0प्र0 अधिनियम सं0 17,1977 द्वारा निकाल दिये गये।

1(12) किसी सहकारी समिति की प्रबन्ध कमेटी के सदस्यों और सभापति और उपसभापति का निर्वाचन जिसमें निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन, महिलाओं और निर्बल वर्ग के सदस्यों के लिए आरक्षण, निर्वाचन विवादों का निपटारा और ऐसे विषयों के सम्बन्ध में शुल्क का उद्ग्रहण भी सम्मिलित है;
(12-क) किसी सहकारी समिति की प्रबन्ध कमेटी में महिलाओं और निर्बल वर्ग के सदस्यों का नाम निर्देशन;
(13) सहकारी समिति की सामान्य बैठक या प्रबन्ध कमेटी की बैठक बुलाना और ऐसी बैठकों की गणपूर्ति तथा प्रक्रिया;
(14) कमेटी को या निबन्धक द्वारा अवक्रान्त या निलम्बित प्रबन्ध कमेटी के स्थान पर नियुक्त प्रशासक अथवा प्रशासकों को देय पारिश्रमिक;
(15) सहकारी समिति की प्रबन्ध कमेटी की सदस्यता के लिए अर्हताएं या अनर्हताएं;
(16) सहकारी समिति के अधिकारियों का समिति के साथ संविदा में हितबद्धहोने पर निर्बन्धन;
(17) सहकारी समितियों में राज्य सरकार की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भागिता से सम्बद्ध विषय;
(18) लाभांश और बोनस के भुगतान प्रयोजनार्थ शुद्व लाभ मे से बांटने से योग्य लाभ का अवधारण तथा समिति की निधियों का प्रर्दशन
(19) सहकारी विकास निधि की स्थापना तथा नियन्त्रण सहकारी समिति द्वारा अपने शुद्व लाभ (Net profit) से निधि में किया जाने वाला भुगतान और निधि के विनियोजन तथा उनके निस्तारण की रीति;
(20) सहकारी समिति की निधियों के विनियोजन की ओर अंशदायी भविष्य निधि की स्थापना तथा उसके विनियोजन की रीति तथा शर्ते;
(21) सहकारी समिति की रक्षित तथा अन्य विधियों का उद्देश्य, उनका उयोग और उनके विनियोजन की रीति;
(22) सहकारी समिति के सभापति होने पर उसकी रक्षित निधि तथा अतिरिक्त निधि (surplus fund) निस्तारण की रीति;
(23) सीमा तथा शर्ते जिसके अधीन रहते हुये सहकारी समिति निक्षेप (deposit) और ऋण प्राप्त कर सकती है;
(24) सहकारी समिति द्वारा सदस्यों (non members) के साथ व्यवहार करने पर निर्बन्धन;
(25) सहकारी समिति द्वारा ऋण देने पर निर्बन्धन;
(26) निक्षेप प्राप्त करने तथा नकद उधार देने वाली सहकारी समितियों द्वारा अनुरक्षित किये जाने वाले अस्थिर साधनों (fluid resources) का स्वरूप तथा मानक;
(27) लेखा परीक्षा का संचालन तथा सहकारी समितियों पर लेखा परीक्षा शुल्क का उद्ग्रहण;
(28) इस अधिनियम के अधीन विभिन्न कार्यवाहियों में, जिनके अन्तर्गत निबन्धक, मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल के समक्ष अथवा न्यायाधिकरणों या प्राधिकारियों के समक्ष अपील और पुनर्विलोकन ग्रहण करने तथा उनका निस्तारण करने की कार्यवाहिय है, अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया;
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1.उ0प्र0 अधिनियम सं0 17,1977 द्वारा रखे गये।

(29) इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों में लिए जाने वाले शुल्क तथा व्यय;
(30) शर्ते जिनके अधीन रहते हुये सहकारी समिति की परिसम्पत्तिय परिसमापक में निहित होगी तथा सहकारी समिति के समापन में अपनायी जाने वाली प्रक्रिया;
(31)सहकारी समिति को प्राप्त या देय धनराशि की वसूली प्रक्रिया;
(32) निर्णय के पूर्व कुर्की करने की रीति और इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों में सम्पत्ति के विक्रय की प्रक्रिया;
(33) न्यायाधिकरण के सदस्यों की अर्हताए;
(34) सहकारी समिति का पता निबन्धित की रीति;
(35) सहकारी समिति द्वारा रखी जाने वाली लेखा बहियॉ तथा रजिस्टर और लेखा बहियों तथा रजिस्टरों में यथाविधि प्रविष्टिय किये जाने के लिए निदेश देने का निबन्धक अधिकार;
(36) कार्य के दौरान में सहकारी समिति द्वारा रखी गयी बहियों में की गयी प्रविष्टियों की ओर लेखों की प्रतिलिपियों के प्रमाणीकरण की रीति;
(37) सहकारी समितियों द्वारा निबन्धक को प्रस्तुत किये जाने वाले विवरण पत्र प्रतिवेदन और विवरणिय;
(38) इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों में वकील के रूप में उपस्थिति होने वाले व्यक्ति पर निर्बन्धन;
(39) लेख्यों का निरीक्षण और उनकी प्रमाणित प्रतिलिपिय देने के लिए शुल्क का उद्ग्रहण;
(40) केन्द्रीय बैंक द्वारा सहकारी समितियों से लिए जाने वाले ब्याज की अधिकतम दर;
(41) सहकारी समितियों से वसूल किये जाने वाले पर्यवेक्षण शुल्कों का उद्ग्रहण;
(42) अवैतनिक आयोजकों तथा अवैतनिक प्रबन्धकों के कर्तव्य तथा कृत्य और उनकी तथा सहकारी समितियों के पदाधिकारियों, प्रतिनिधियों और अन्य सदस्यों को भत्ते तथा मानदेय का भुगतान;
(43) अधिनियम तथा नियमों के अधीन संसूचित या प्रकाशित किए जाने के लिए अपेक्षित किसी आदेश, निर्णय या अभिनिर्णय को संसूचित या प्रकाशित करने की रीति, और
(44) कोई अन्य विषय जो नियत किया जाये अथवा जो नियत किये जाने के लिए अपेक्षित हो।
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टिप्पणी



धारा 130 (1) के अधीन राज्य सरकार अधिनियम के उद्देश्यो का कार्यान्वयन करने के लिए नियम बनाने के लिए सशक्त है। उपधारा (2) के खण्ड (ii) के अधीन, वह विशेषतया तथा उपधारा (1) के अधीन शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे विषयों के सम्बन्ध में नियम बनाने के लिए सशक्त है कि जिनके सम्बन्ध में कोई सहकारी समिति उप विधिय बना सकेगी या बनायेगी। अतः प्रबन्ध कमेटी को अपने द्वारा निर्वाचित किसी पद धारक को अविश्वास के संकल्प द्वारा पद से हटाने के विषय में कोई उप विधि एक
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1.उ0प्र0 अधिनियम सं0 17,1977 द्वारा निकाल दिये गये।

विधिमान्य कानून होगी, कयोकि वह अधिनियम की धारा 4 की अपेक्षाओं के अनुपालन में होगी। अधिनियम की धारा 130 (2) (ii) के कारण राज्य सरकार की यह भी शक्ति है ‍ि वह उसी प्रकार के नियम बना सकती है। जो भी हो, अधिनियम का एक प्रयोजन यह भी है कि वह यह भी सुनिश्चित करे कि अधिनियम के अधीन निबन्धित सहकारी समितियों का संविधान लोकतांत्रिक हो। अतः पद से हटाये जाने के सम्बन्ध में बनाये गये किसी नियम या बनाई गई किसी उपविधि के विषय में यह नही कहा जा सकता ‍ि वह अलोकतांत्रिक है।