अध्याय 2
सहकारी समितियों का निबन्धन



धारा-4. समि‍तियॉ जो निबन्धित की जा सकती हैं - इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, कोई समिति जिसका उददेश्य सहकारी सिद्धान्तों के अनुसार अपने सदस्यों के आर्थिक हितों की उन्नति करना हो अथवा कोई समिति जो उक्त समिति के कार्य-संचालन को सुगम बनाने के उददेश्य से स्थापित की गयी हो इस अधिनियम के अधीन निबन्धित की जा सकती है।
स्पष्टीकरण - सहकारी सिद्धान्तों के अन्तर्गत निम्नलिखित होंगे-
(क) लोक सदाचार, शिष्टता तथा भारत के संविधान में प्रतिपादित राज्य की नीति के संगत निदेशक तत्वों के अनुसार सदस्यों के आर्थिक हित की उन्नति,
(ख) लाभ की भावना को विनियमित तथा निबन्धित करना,
(ग) मितव्ययिता, पारस्परिक सहायता तथा स्वावलम्बन को बढाना,
(घ) स्वैच्छिक सदस्यता, और
(ड़) समिति का लोकतांत्रिक संघटन।


टिप्पणी


इस अधिनियम के अधीन किसी समिति का निबन्ध तभी हो सकता है जबकि उसका संविधान लोकतांत्रिक हो। किसी लोकतान्त्रिक संगठन के लिए यह जरूरी है कि वह ऐसा

1. उ0 प्र0 अधिनियम सं0 12, 1976 के द्वारा बढायी गयी तथा सदैव से बढायी गयी समझी जायेगी(3.10.1975 से प्रभावी)।

विधान करे कि उसके पदधारकों का निर्वाचन ऐसे लोगों के बहुमत से होगा जो कि निर्वाचन में भाग लेने के लिए हकदार हों। यदि कोई पदधारक निर्वाचन मण्डल का विश्वास खो देता है और उस पर भी वह पद पर बना रहता है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि उस संगठन का संविधान लोकतान्त्रिक है। अतः यदि ऐसा कोई नियम बनाया जाए जोकि प्रबन्धक समिति को यह शक्ति प्रदान करे कि वह अपने द्वारा निर्वाचित किसी पदधारक को अविश्वास के संकल्प द्वारा हटा सकती है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसा नियम इस अधिनियम की धारा 4 के विरूद्ध है।