धारा-70. विवाद जो मध्यस्थ निर्णय के लिए भेजे जा सकते हैं- (1) तत्समय प्रचलित किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी, यदि सहकारी समिति के संगठन, प्रबन्ध अथवा कार्य के सम्बन्ध में, समिति के वेतन भोगी कर्मचारी के विरूद्ध की गयी अनुशासनिक कार्यवाही में सम्बद्ध विवाद से भिन्न कोई विवाद-
(क) सदस्यों, भूतपूर्व सदस्यों और मृत सदस्यों के माध्यम से दावा करने वाले व्यक्तियों के बीच; अथवा
(ख) किसी सदस्य, भूतपूर्व सदस्य या मृत सदस्य के माध्यम से दावा करने वाले किसी व्यक्ति, और समिति, उसकी प्रबन्ध कमेटी, जिसे आगे इस अध्याय में कमेटी अभिर्दिष्ट किया गया है, अथवा समिति के अधिकारी, अभिकर्ता या कर्मचारी जिनके अन्तर्गत भूतपूर्व अधिकारी, अभिकर्ता या कर्मचारी भी हैं, के बीच; अथवा
(ग) समिति अथवा उसकी कमेटी और समिति किसी भूतपूर्व कमेटी, या किसी अधिकारी, अभिकर्ता या कर्मचारी या किसी भूतपूर्व अधिकारी, भूतपूर्व कर्मचारी अथवा समिति के किसी मृत अधिकारी, मृत अभिकर्ता या मृत कर्मचारी द्वारा नाम निर्दिष्ट व्यक्ति, या उसके दायाद अथवा विधिक प्रतिनिधि के बीच; अथवा
(घ) किसी सहकारी समिति और किसी अन्य सहकारी समिति अथवा समिति के बीच उत्पन्न हो;
तो वह इस अधिनियम और नियमों के उपबन्धों के अनुसार कार्यवाही के लिये निबन्धक को अभिर्दिष्ट किया जायेगा और किसी ऐसे विवाद के सम्बन्ध में किसी न्यायालय को कोई वाद अथवा अन्य कार्यवाही ग्रहण करने का क्षेत्राधिकार प्राप्त न होगा।
1[प्रतिबन्ध यह है कि इस अधिनियम या इसके अधीन बनाये गये नियमों के उपबन्धों के अधीन किसी निर्वाचन से सम्बन्धित कोई विवाद निबन्धक को तब तक निर्दिष्ट नही किया जायेगा जब तक ऐसे निर्वाचन का परिणाम घोषित कर दिया जाये।]
(2) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए समिति के संघटन, प्रबन्ध अथवा कार्य के सम्बन्ध में विवादों में निम्नलिखित सम्मिलित समझे जायेंगे, अर्थात-
(क) देय धनराशि के लिये दावे, जब भुगतान की मग की जाये और वह या तो अस्वीकृत कर दी जाये अथवा उसका अनुपालन न किया जाये, चाहे ऐसे दावे विरोधी पक्ष द्वारा स्वीकार किये गये हों अथवा न किये गये हों,
(ख) प्रतिभू द्वारा मुख्य ऋणों के विरूद्ध दावा, जब समिति ने ऐसे ऋण या मग के सम्बन्ध में जो उसे मुख्य ऋणी द्वारा देय हो, कोई धनराशि मुख्य ऋणी की चूक के फलस्वरूप प्रतिभू से वसूल कर ली हो, चाहे ऐसा ऋण या मग स्वीकार की गयी हो अथवा नहीं,
(ग) समिति द्वारा किसी ऐसी हानि के लिए दावा जो उसे किसी सदस्य, अधिकारी, अभिकर्ता अथवा कर्मचारी से पहुंची हो, जिसके अन्तर्गत भूतपूर्व या मृत सदस्य, अधिकारी, अभिकर्ता या कर्मचारी भी हैं, चाहे वह हानि व्यक्तिगत रूप से पहुंचायी गई हो या सामूहिक रूप से और चाहे ऐसी हानि स्वीकार की गयी हो या नहीं, तथा

(घ) उपविधियों में उल्लिखित समिति के उददेश्यों से सम्बद्ध सभी विषय और पदाधिकारियों (office bearers) के निवार्चन से सम्बद्ध विषय भी।
(3) यदि यह प्रश्न उठे कि इस धारा के अधीन निबन्धक को अभिर्दिष्ट कोई विवाद, सहकारी समिति के संगठन, प्रबन्ध अथवा कार्य के सम्बन्ध में विवाद है या नहीं तो उस पर निबन्धक का निर्णय अन्तिम होगा और उस पर किसी न्यायालय में आपत्ति नहीं की जायेगी।


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धारा 70 में अन्तर्विष्ट सिविल न्यायालय की अधिकारिता का अपवर्जन वह लागू न होगा जह  कि किसी कर्मचारी द्वारा सहकारी समिति के विरूद्ध कोई वाद इस आधार पर योजित किया जाये कि सेवा से उसकी छटनी अवैध रूप से की गई है। इस प्रकार का वाद सिविल न्यायालय में दायर किया जा सकता है क्योंकि ऐसे वाद के विषय में यह नहीं कहा जा सकता है कि वह समिति के व्यवसाय को प्रभावित करने वाला कोई विवाद है।
उ0 प्र0 सहकारी समिति अधिनियम, धारा 70(1)(क) उ0 प्र0 सहकारी समिति नियमावली, 1968 नियम 2(1) तथा 229(2), उ0 प्र0 सामान्य खण्ड अधिनियम 1904, धारा 19-क, भारत का संविधान, अनुच्छेद 226-सोसाइटी बैंक के प्रतिनिधियों के जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष निर्वाचन के धारा 70(क) के अधीन उत्पन्न विवाद-प्रबन्ध समिति के निर्वाचन को स्थिगित किये जाने का आदेशयह प्रश्न कि आया ऐसा आदेश अधिकारिता के भीतर है- यह धारण किया गया कि ऐसा आदेश अधिकारिता रहित होगा- ऐसा आदेश पारित करने के लिए धारा 19-क का आश्रय नहीं लिया जा सकता। धारा 70(1)(क) के अधीन शक्तिय परिभाषित है तथा एकीकृत (United) हैं और उनका प्रयोग उस सीमा तक नहीं किया जा सकता है कि जिस सीमा तक अनुच्छेद 226 के अधीन शक्तियों का प्रयोग किया जा सकता- इस प्रकार के स्थगन आदेश को अधिकारिता रहित होने के कारण अनुच्छेद 226 के अधीन शक्तियों के प्रयोग में अभिखण्डित किया जा सकता है। राम गुलाम बनाम जिला मजिस्ट्रेट, लखनऊ आदि। 1984 UPLBEC 32
उ0 प्र0 सहकारी समिति अधिनियम, 1965, धारा 70(2)(ग)- समिति के धन के दुरूपयोजन अथवा त्रुटिपूर्ण उपयोजन के विषय में विवाद कमेटी की शक्तिय -यदि किसी कर्मचारी के विरूद्ध इस प्रकार का आरोप सिद्ध हो जाये-तो कमेटी उसे गैरकानूनी ढंग से व्यय किये गये धन की अदायगी के लिए कर्मचारी को निदेश कर सकेगी। शरीफ अहमद बनाम उप-निबन्धक सहकारी समिति, उत्तर प्रदेश आगरा आदि। 1981 UPLBEC 445
यदि एक बाद समिति द्वारा वादी के पक्ष में विक्रय पत्र निष्पादित कर दिया गया तो समिति के उददेश्य की, अर्थात सदस्यों के साथ भू-खण्डों के प्रबन्ध, पूर्णरूपेण पूर्ति हो गई। समिति का स्वत्व सदस्यों को अन्तरित हो गया तत्पश्चात् समिति का भूमि पर कब्जा बनाये रखने अथवा उस पर पुनः कब्जा प्राप्त करने का कोई भी प्रयत्न अवश्यमेव समिति के उददेश्यों के अधिकारातीत (ultra vires) होगा। उस कार्य को समिति से सम्बन्धित ऐसा विषय नहीं कहा जा सकता कि जिनका उल्लेख उपविधियों में किया गया हो।
इस बात को ध्यान में रखते हुये कि भूमि का स्वत्व विक्रय-पत्र दिनांक 21.4.69 के अधीन, जिसका निष्पादन समिति ने किया है, वादी के पक्ष में अन्तरित हो चुका है, समिति के भूमि पर कब्जा बनाये रखने अथवा उन पर पुनः कब्जा प्राप्त करने के प्रयत्न के पश्चात्वर्ती कार्य की धारा 70(2)(घ) के अन्तर्गत कोई विषय नहीं कहा जा सकता। इस दृष्टिकोण के फलस्वरूप इस अधिनियम की धारा 111 भी लागू न होगी। इसका अर्थ यह हुआ कि धारा 117 भी, जो कि वाद दायर करने से पूर्व कतिपय औपचारिकताओं के लिये जाने की अपेक्षा करती है, लागू नहीं होगी। थारूमल बनाम पीलीभीत कोआपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी, पीलीभीत, 1984 UPLBEC 244


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धारा 70- पंच (Arlutrator) की शक्तियॉ - इस पर कोई विवाद नहीं है कि धारा 70 के अधीन कोई पंच केवल उसी विवाद पर निर्णय देगा जिसका उसको अधिनियम के अधीन निर्देश किया जाये। प्रस्तुत मामले में, पंच को निर्दिष्ट एक मात्र विवाद यही था कि आया सहकारी समिति द्वारा दावाकृत रकम तीनों ऋणी व्यक्तियों द्वारा उसको देय थी या नहीं। इस विवाद कि आया उक्त रकम के लिये दायित्व शीश राम का था या नहीं, निर्देष पंच को नहीं किया गया था। ऐसी परिस्थितियों में पंच या सहायक निबन्धक, किसी की भी यह अधिकारित नहीं थी कि वह शीश राम के विरूद्ध कोई प्रभावी आदेश पारित करता।
शीश राम बनाम सहायक निबन्धक, सहकारी समिति, 1966 ए0एल0जे0 747, पृष्ठ 748 व 749: 1986 इला0सी0जे0 108: 1986 यू0पी0एल0बी0सी0।

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1. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 17, 1977 के द्वारा बढाये गये।