अध्याय 13
निधियों का विनियोजन


173. (1)कोई भी सहकारी समिति अपनी निधियों को निम्नलिखित किसी भी एक या अधिक प्रकार से विनियोजित अथवा जमा कर सकती है -
(एक) धारा 59 के खण्ड (क) से (ग) में व्यवस्थित किसी भी प्रकार
(दो) पोस्ट आफिस सेविंग्स बैंक,
(तीन) केन्द्रीय या राज्य सरकार द्वारा चलायी गया कोई बचत योजना,
(चार) किसी ऐसे नियम या अन्य निगमित निकाय के अंश जिससे केन्द्रीय या राज्य सरकार अथवा दोनों को मिलाकर पचास प्रतिशत से अधिक अंश हो, और
(पच) किसी निगम या निगमित निकाय द्वारा चालू किये गये ऋण-पत्रों यदि ऐसे ऋण पत्रों के सम्बन्ध में केन्द्रीय या राज्य सरकार अथवा रिजर्व बैंक आफ इण्डिया द्वारा गारण्टी दी गयी है।
(2) कोई सहकारी समिति किसी अन्य सहकारी समिति अथवा समितियों के अंशों में अपनी रक्षित निधि के एक चथाई से अधिक और निबन्धक के सामान्य या विशेष अनुज्ञा से आधे से अधिक धनराशि विनियोजित नहीं करेगी।
(3) कोई सहकारी समिति निबन्धक की अनुज्ञा से ऐसे अखिल भारतीय स्वरूप की किसी सहकारी समिति का अंश खरीद सकती है, जिस पर बहुएकक सहकारी सोसाइटी अधिनियम 1942 (अधिनियम संख्या 6 सन् 1942) अथवा अखिल भारतीय स्वरूप के सहकारी समितियों से सम्बद्ध कोई अन्य अधिनियम लागू होता है।
प्रतिबन्ध यह है कि निबन्धक अनुज्ञा देने से तब तक इन्कार नहीं करेगा जब तक उसके लिये ऐसे विशेष कारण न हो, जिन्हें ऐसी अनुज्ञा के इन्कार करने पर अभिलिखित किया जायेगा।
(4) कोई केन्द्रीय सहकारी बैंक या उत्तर प्रदेश को-आपरेटिव बैंक विधि दायित्वों के रूप में रखी जाने वाली धनराशि को छोड़कर शेष धनराशि का विनियोजन लाभप्रद मदों में जो भारतीय रिजर्व बैंक या राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक द्वारा दिये मापदण्डों और शर्तो के अधीन होगा, कर सकता है।
174. केन्द्रीय या शीर्ष सहकारी बैंक अपनी निधियां किसी ऋण न देने वाली समिति के अंशों में सिवा उस सीमा तक तथा ऐसी शर्तो के अधीन जैसा कि रिजर्व बैक आफ इण्डिया इस सम्बन्ध में निर्देष्ट करें, विनियोजित नहीं करेगी।

175. कोई भी सहकारी समिति, असीमित दायित्व वाली किसी अन्य सहकारी समिति के अंश नहीं खरीदेगी।
176. कोई सहकारी समिति, निबन्धक की पूर्व स्वीकृत से, अपनी सम्पूर्ण निधि या उसका कोई भाग भूमि खरीदने या पटटे पर लेने अथवा किसी ऐसे भवन को, जो उसके कारोबार के संचालन के लिये आवश्यक हो, खरीदने, उसका निर्माण करने, विस्तार करने या फिर से बनाने के लिये विनियोजित कर सकती है। इस प्रकार विनियोजित निधि की धनराशि की प्रतिपूर्ति ऐसी शर्तो पर की जायेगी। जो निबन्धक द्वारा प्रत्येक मामले में अवधारित की जाये:
प्रतिबन्ध यह है कि यह नियम निम्नलिखित पर लागू न होगा -
(क) (1) समिति को देय किसी धनराशि की वसूली के लिये उसके द्वारा प्राप्त किसी बिक्री, आदेश या अभिनिर्णय के निष्पादन में की गई किसी डिक्री में, समिति द्वारा अथवा।
(2) किसी समिति को देय किसी धनराशि की वसूली के लिये, उस समिति द्वारा (जब वह वित्तपोषण बैंक की ऋणी हो) प्राप्त किसी डिक्री आदेश या अभिनिर्णय के निष्पादन में की गई बिक्री में या ऐसी समिति के परिसमापक द्वारा उसकी ओर से डिक्री में किसी वित्तपोषण बैंक द्वारा क्रय की गई अचल सम्पत्ति पर,
(ख) भूमि खरीदने या पटटे देने अथवा किसी ऐसे समिति के भवन खरीदने, उसका निर्माण करने या उसे फिर से बनाने पर जिसकी उपविधियों के अनुसार उसके उद्देश्य में इस प्रकार खरीदना, पटटे पर बना निर्माण या फिर से बनाना भी है, या
(ग) किसी समिति की रक्षित निधि के विनियोजन पर, यदि ऐसा विनियोजन नियम 165 और 166 द्वारा नियन्त्रित हो।
प्रतिबन्ध यह भी है कि इस नियम के अधीन विनियोजित धनराशि की प्रतिपूर्ति आवश्यक न होगी जब विनियोजन -
(1) किसी समिति द्वारा अपने लाभ से संगठित अपनी भवन निधि से, या
(2) किसी सहकारी आवास समिति द्वारा किया जाये।
176. क कोई सहकारी समिति, निबन्धक की पूर्व स्वीकृति से, समिति के लाभ के लिये किसी स्थावर सम्पत्ति का विक्रय, बन्धक, पटटा, लाइसेन्स या अन्यथा संक्रमण कर सकती है:
प्रतिबन्ध यह है कि निबन्धक ऐसे विक्रय, बन्धक, पटटा, लाइसेन्स इत्यादि की स्वीकृति प्रदान करने के पूर्व, यथास्थिति, सरकारी समिति, प्रबन्ध कमेटी या उसके सदस्यों पर ऐसी जांच करा सकता है या ऐसी शर्ते या निबन्धन अधिरोपित कर सकता है जैसी वह आवश्यक समझे।
177. कोई भी सहकारी समिति, कोई मोटर गाड़ी खरीदने के लिये अपनी निधियों का प्रयोग न करेगी जब तक -
(1) किसी समिति को प्रबन्ध कमेटी द्वारा इस आशय का संकल्प पारित न कर दिया जाये और ऐसा संकल्प सामान्य निकाय की पूर्व प्राधिकृत के अनुसार हो और
(2) इस प्रकार की खरीद के लिये निबन्धक से पूर्व अनुज्ञा न प्राप्त कर ली जाये।


प्रतिबन्ध यह है कि इस प्रकार की अनुज्ञा निम्नलिखित सम्बन्ध में आवश्यक नहीं होगी।
(1) किसी ऐसी समिति की दशा में जो पिछली लेखा परीक्षा में श्रेणी क अथवा ख में रखी गई हो, अथवा
(2) किसी मोटर परिवहन सहकारी समिति की दशा में यदि मोटर गाड़ी की, अपनी परिवहन सम्बन्धी कारोबार चालू रखने के लिये आवश्यकता हो।
स्पष्टीकरण-"मोटर गाड़ी" का तात्पर्य मोटर वेहिकिल्स ऐक्ट, 1930 (ऐक्ट संख्या-4, 1939) में यथापरिभाषित शब्द मोटर वेहिकिल्स में है:

नई नियमावली 176-क अधिसूचना सं0 965/49-1-2003-500(24)/2003 दिनांक 28 मई, 2003 द्वारा बढ़ायी गयी जो उ0प्र0 असाधारण गजट भाग-4 खण्ड (ख) दिनांक 28 मई 2003 को प्रकाशित हुआ।

अधिसूचना संख्या 2700/49-1-94-7-(1)-94 दिनांक 15.07.94 द्वारा बदला गया