अध्याय 15
ऋणों पर निर्बन्धन



187. निबन्धक की अनुमति के बिना असीमित दायित्व वाली कोई भी सहकारी समिति अचल सम्पत्ति की प्रतिभूति पर ऋण नहीं देगी।
188. (1) किसी नगर केन्द्रीय बैंक से भिन्न कोई केन्द्रीय बैंक अपने व्यक्ति सदस्यों को निम्नलिखित दशा को छोड़कर ऋण नहीं देगा।
यदि व्यक्ति सदस्य का बैंक में चालू खाता हो तो उसे उसी शर्तो तथा निर्बन्धनों के अधीन रहते हुये जो बैंक आरोपित करें, छः माह से अनाधिक अवधि के लिये अधिविकर्ष (ओवर ड्राफ्ट) की अनुज्ञा दी जा सकती है:
प्रतिबन्ध यह है कि इस प्रकार अनुज्ञेय अधिविकर्ष की धनराशि किसी भी दशा में किसी भी समय 2500 रूपया या बैंक के सन्तोषनुसार व्यक्ति सदस्य की मासिक आय से इसमें जो भी कम हो अधिक न होगा:
(2) यदि व्यक्ति सदस्य का सावधि या आवर्तक निक्षेप खाता हो तो उसे निक्षेप की प्रतिभूति पर इस प्रकार धृत धनराशि के 90 प्रतिशत से अनधिक ऋण की अनुज्ञा दी जा सकती है।
(3) ऐसी शर्तो और निर्बन्धनों के अधीन रहते हुये वह जो आरोपित करें, कोई केन्द्रीय बैंक, धारा 61 की उपधारा (2) के अधीन अपने असदस्य निक्षेपकों को उसके निक्षेपों की प्रतिभूति पर ऋण दे सकता है।
प्रतिबन्ध यह है कि ऋण बैंक में निक्षेप की धनराशि के 90 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।
188क (क) उत्तर प्रदेश कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड, लखनऊ और जिल/केन्द्रीय सहकारी बैंक, ऐसे निर्बन्धनों और शर्तो के अधीन रहते हुये, जिन्हें उत्तर प्रदेश कोआपरेटिव बैंक, लिमिटेड, लखनऊ समय-समय पर भारतीय रिर्जव बैंक द्वारा जारी किये गये अनुदेशों के अनुसार आरोपित करें, कृषि प्रयोजनों से भिन्न प्रयोजन के लिये अलग-अलग नाम-मात्र सदस्यों को ऋण दे सकता है:
प्रतिबन्ध यह है कि ऐसे निर्बन्धन और शर्ते राज्य के निबन्धक का पूर्वानुमोदन प्राप्त करने के पश्चात् ही विधिमान्य समझी जायेगी।
टिप्पणी-(1) राज्य का निबन्धक का तात्पर्य अधिनियम की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन राज्य सरकार द्वारा नियुक्त निबन्धक से है।
(2) जिला/केन्द्रीय सहकारी बैंक किसी निष्क्रिय या निश्चेष्ट सहकारी समिति के अव्यतिक्रमी सदस्यों को अल्पकालीन ऋण दे सकता है।
स्पष्टीकरण-(1) इस उपनियम में प्रयुक्त शब्द निश्चेष्ट का तात्पर्य ऐसी समिति से है जो अपने निबन्धन के छः मास के भीतर अपना कार्य प्रारम्भ करने में विफल रहें।
(2) इस उपनियम में प्रयुक्त शब्द निष्क्रय का तात्पर्य ऐसी समिति से है:
(क) जहां साधारण सदस्यों की संख्या ऐसी समिति के निबन्धन के लिये धारा 6 में यथा उपबन्धित न्यूनतम से कम कर दी गयी है, या
(ख) जहां निबन्धक की राय हो कि धारा 72 के अधीन समिति को समापित कर देना चाहिये, या
(ग) जहां सहकारी समिति अपने उद्देश्यों को पूरा न कर रही हो या धारा 7 की उपधारा (1) के खण्ड (घ) की अपेक्षाओं की पूर्ति न कर रही हो।
189. कोई भी सहकारी समिति निबन्धक अनुज्ञा के बिना किसी असदस्य की प्रतिभूति द्वारा सुरक्षित बन्ध-पत्र पर किसी सदस्य को ऋण न देगी।
190. प्रतिभूति की सहमति के बिना ऐसी अवधि, जिसके लिये किसी सहकारी समिति द्वारा ऋण स्वीकृत किया गया हो, बढ़ाई नहीं जायेगी।
191. निबन्धक की पूर्व अनुज्ञा के बिना कोई भी केन्द्रीय बैंक सहकारी कृषि समितियों को दिये गये ऋणों पर अपने ब्याज की दर में कोई वृद्धि नहीं करेगा और न वह ऐसी समितियों से उधार लेने की अपनी औसत दर से 3 प्रतिशत से अधिक दर पर ब्याज ही लेगा।

स्पष्टीकरण-उधार लेने की औसत दर का तात्पर्य ब्याज की उस दर से है जिसे कुल उधार को (अर्थात् चालू लेखे में धृत निक्षेपों के अतिरिक्त अन्य समस्त ऋण तथा निक्षेप) और पूर्ववर्ती सहकारी वर्ष में ऐसे उधारों पर खर्च किये गये कुल ब्याज को हिसाब में शामिल करने के पश्चात् निकाला गया हो:

1. उ0प्र0 सहकारी समिति (तेरहवॉ संशोधन) नियमावली, 1981 द्वारा बढ़ाया गया।Noti No 3723/XII-C-I-81-7(3)-1977 dt 7-11-1981

 
स्पष्टीकरण-उधार लेने की औसत दर का तात्पर्य ब्याज की उस दर से है जिसे कुल उधार को (अर्थात् चालू लेखे में धृत निक्षेपों के अतिरिक्त अन्य समस्त ऋण तथा निक्षेप) और पूर्ववर्ती सहकारी वर्ष में ऐसे उधारों पर खर्च किये गये कुल ब्याज को हिसाब में शामिल करने के पश्चात् निकाला गया हो:
192. ऐसी सहकारी समिति जो अपने सदस्य को ऋण दे, एक सीमा निश्चित करेगी, जिससे अधिक किसी सदस्य के विरूद्ध कोई ऋण बकाया नहीं रहेगा। इस प्रकार निश्चित सीमा, किसी ऐसी सहकारी समिति की दशा में, जो किसी केन्द्रीय बैंक का उधार लेने वाला सदस्य हो सम्बद्ध केन्द्रीय बैंक के अनुमोदन के अधीन होगी और अन्य समितियों की दशा में वह निबन्धक के सामान्य या विशेष आदेश के अनुमोदन के अधीन होगी।
193. किसी केन्द्रीय बैंक से भिन्न कोई सहकारी समिति अपने सदस्यों से ऋण पर उस अधिकतम दर से जो निबन्धक द्वारा समय-समय पर निश्चित की जाये, अधिक दर ब्याज नहीं लेगी।
194. बैंकिग लाज (अप्लीकेशन टु कोआपरेटिव सोसायटीज) ऐक्ट 1965 (ऐक्ट संख्या-23, 1965) द्वारा यथा संशोधित बैंकिग रेगुलेशन ऐक्ट 1949 के उपबन्धों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना और ऐसी शर्तो और निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए जो निबन्धक द्वारा तदर्थ आरोपित किये जाये, निबन्धन सीमित दायित्व वाली किसी सहकारी समिति को अपनी निधियों का अपने सदस्यों के ऐसे बिलों पर कमीशन काटकर भुगतान करने या फिर ये कमीशन काट कर भुगतान करने में और उनके बिलों तथा रेलवे रसीदों का इक्ठठा करने में उपयोग करने की अनुज्ञा दे सकता है।
195. (क) वेतन या मजदूरी अर्जित करने वालों की किसी सहकारी समिति की दशा में समिति अपने किसी भी सदस्य को तब तक ऋण नहीं देगी जब तक कि सदस्य धारा 40 की उपधारा (1) में की गई व्यवस्था के अनुसार समिति के पक्ष में अनुबन्ध निष्पादित न कर दें।
(ख) सहकारी समिति सदस्य को ऋण दिये जाने के एक पखवारे के भीतर, सदस्य द्वारा निष्पादित अनुबन्ध की एक यथाविधि प्रमाणित प्रति सम्बद्ध सेवायोजक या वेतन विवरण प्राधिकारी को उक्त अनुबन्ध के अधीन कटौती करने के लिये भेज देगी।
196. कोई भी सहकारी समिति जिसके मुख्य उद्देश्य में अपने सदस्यों की ऋण या वित्तीय सहायता देना नहीं है, निबन्धक की विशेष स्वीकृत के बिना किसी सदस्य को न तो ऋण देगी और न वित्तीय अनुग्रहण देगी।
197. कोई भी सहकारी समिति सिवाय अधिनियम, नियम या समिति के उपविधियों के उपबन्धों के अनुसार या जब निबन्धक के सामान्य या विशेष आदेश से ऐसे व्यवहार के लिये पूर्वानुमोदन ले लिया जाये, किसी अन्य सहकारी समिति को न तो ऋण, अग्रिम धनराशि या निक्षेप देगी और न उससे ऋण, अग्रिम धनराशि या निक्षेप लेगी।
198. 1[* * * ]
199. 2[* * * ]
200. सिवाय धारा 60 और 61 और नियमों में की गई व्यवस्था के, कोई भी सहकारी समिति किसी असदस्य के साथ सिवाय समिति की उपविधियों के अधीन या निबन्धक की सामान्य या विशेष अनुमति के अधीन से, समिति के कारोबार के सम्बन्ध में कोई व्यवहार नहीं करेगी।

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1. उत्तर प्रदेश असाधारण गजट की अधिसूचना सं0-196-सी-1/12सी0ए0-5(1)-69-बी, दिनांक 20 जून 1972 द्वारा निकाले गये।
2. उत्तर प्रदेश असाधारण गजट की अधिसूचना सं0-196-सी-1/12 सी0ए05(1)-69-बी, दिनांक 20 जून 1972 द्वारा निकाले गये।