अध्याय 19
अपील और पुनर्विलोकन


252. 1[* * *]
2[253. न्यायाधिकरण में निम्नलिखित तीन व्यक्ति होंगे -
(क) जिला जज या कोई सेवा निवृत्त जिला जज जो अध्यक्ष होगा:
(ख) राज्य सहकारी सेवा समूह क का कोई सेवा निवृत्त या सेवारत अधिकारी सदस्य, और
(ग) प्रशासनिक सेवा का कोई सेवा निवृत्त या सेवारत अधिकारी जिसे उत्तर प्रदेश के सहकारिता विभाग या गन्ना विभाग या अद्योग विभाग या सामुदायिक विकास विभाग में कार्य करें का अनुभव हो।
सदस्य
प्रतिबन्ध यह है कि यदि अध्यक्ष या सदस्य इस रूप में अपनी नियुक्ति के पूर्व अपनी मूल सेवा से सेवा निवृत्त न हुआ हो तो वह
(क) अपनी मूल सेवा से सेवा निवृत्त होने पर अपनी पेंशन, उपदान और सेवा निवृत्ति के पश्चात् छुटटी नकदीकरण आहरित करने का हकदार होगा और अपने भविष्य निधि से अवशेष का आहरण करेगा मानो वह सेवा निवृत्त हो गया हो,
(ख) नियम 255 क अनुसार अध्यक्ष या सदस्य के पद से उसके सेवा निवृत्त होने पर अतिरिक्त पेंशन, उपदान और सेवा निवृत्ति के पश्चात् छुटटी नकदीकरण का हकदार होगा जिसकी गणना निम्न प्रकार से की जायेगी:
प्रथम ऐसी सेवा निवृत्ति के दिनांक को लागू नियमों के अनुसार धनराशियों की पुनः गणन की जायेगी मानो वह अपनी मूल सेवा से कभी सेवा निवृत्त न हुआ हो और उसकी सेवा में विस्तार हो गया हो:
द्वितीय मूल सेवा से सेवा निवृत्त होने पर उसे खण्ड (क) के अधीन भुगतान की गयी धनराशियों की कटौती कर ली जायेगी और अन्तर उसे देय होगा।
254. (1) (क) अध्यक्ष और सदस्यों को अनुमन्य वेतनमान ऐसे होंगे जैसे राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर पर निर्धारित किये जायेंगे।
(ख) उत्तर प्रदेश सहकारी समिति (सत्ताइसवां संशोधन) नियमावली 1995 के प्रारम्भ के समय वेतनमान निम्न प्रकार है:-
पद का नाम वेतनमान
(क) अध्यक्ष 5900-200-6700 रूपये
(ख) सदस्य 4500-150-5700 रूपये
प्रतिबन्ध यह है कि अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्त किसी व्यक्ति का, जो जिला जज या राज्य सरकार के अधीन किसी सेवा से निवृत्त हुआ हो, वेतन ऐसी सेवानिवृत्त के समय उसे भुगतान किये गये या देय वेतन से कम नहीं होगा:
अग्रेत्तर प्रतिबन्ध यह है कि प्रथम प्रतिबन्धात्मक खण्ड में निर्दिष्ट कोई व्यक्ति जो पेंशन के रूप में सेवा निवृत्त लाभों को प्राप्त कर रहा हो या प्राप्त करने का हकदार हो गया हो, के ऊपर लिखित वेतन की पेंशन की कुल धनराशि के जिसमें पेंशन का राशिकृत भाग यदि कोई हो भी सम्मिलित है, बराबर कम कर दिया जायेगा।

1. नियम 252 अधिसूचना संख्या 2700/XLIX -1-94-7-(1)-94  दिनांक 15.07.1994 द्वारा निकाल दिया गया।
2. नियम 253,254 अधिसूचना संख्या 1884/49-1-7-1995-7(10)-94 दिनांक 05.06.1995 द्वारा बदला गया।


(2) अध्यक्ष और किसी सदस्य को उनके वेतन के अनुसार राज्य सरकार के समूह क के अधिकारियों को अनुमन्य दर पर समुचित महंगाई भत्ता और अन्य भत्ते प्राप्त होंगे।
(3) न्यायाधिकरण में अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्त कोई व्यक्ति ऐसी छुटटी अन्य सम्बन्धित लाभों का हकदार होगा जो राज्य सरकार के समूह क के अधिकारियों को अनुमन्य हों।
(4) न्यायाधिकरण के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति नियम 253 के प्रतिबन्धात्मक खण्ड के साथ पठित राज्य सरकार के समूह क के अधिकारियों पर लागू नियमों के अनुसार पेंशन और उपदान का हकदार होगा।
(5) अध्यक्ष या सदस्य अपने विकल्प पर सामान्य भविष्य निधि में अभिदान करने का हकदार होगा और उसके द्वारा ऐसा विकल्प चुनने की स्थिति में वह समय-समय पर यथा संशोधित सामान्य भविष्य निधि (उत्तर प्रदेश) नियमावली 1985 के उपबन्धों द्वारा शासित होगा:
प्रतिबन्ध यह है कि यदि अध्यक्ष या सदस्य न्यायाधिकरण में कार्यभार ग्रहण करने के ठीक पूर्व उत्तर प्रदेश उच्चतर न्यायिक सेवा या किसी अखिल भारतीय सेवा का सदस्य था, तो वह उन नियमों द्वारा शासित होगा जो न्यायाधिकरण में कार्यभार ग्रहण करने के ठीक पूर्व उस पर लागू थे।
(6) अध्यक्ष या सदस्य, जब दौरे पर या स्थानास्तरण पर हो, (जिसके अन्तर्गत न्यायाधिकरण में कार्यभार ग्रहण करने के लिये की गयी यात्रा भी सम्मिलित है) उन्हीं दरों पर यात्र भत्ता व्यक्तिगत सामान के परिवहन और इसी प्रकार के अन्य विषयों के लिये हकदार होगा जो उतना ही वेतन आहरित करने वाले राज्य सरकार के समूह क के अधिकारी को अनुमन्य हो।
(7) न्यायाधिकरण में अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति को राज्य सरकार में उसके स्तर के बराबर किसी अधिकारी के अनुमन्य प्रकार का आवास निःशुल्क उपलब्ध कराया जायेगा।
प्रतिबन्ध यह है कि यदि राज्य सरकार द्वारा ऐसा आवास उपलब्ध न कराया जाये तो अध्यक्ष या सदस्य ऊपर विनिर्दिष्ट आवास स्वयं नहीं लेता है तो उन्हें उनके द्वारा वास्तव में भुगतान किये गये मकान के किराये की प्रतिपूर्ति दो हजार रूपये प्रति माह की अधिकतम सीमा तक की जायेगी।
अग्रेत्तर प्रतिबन्ध यह है कि यदि अध्यक्ष या सदस्य अपने निजी या अपने/अपने पति/पत्नी के आवास में रह रहा है तो वह इस सम्बन्ध में राज्य सरकार के नियमानुसार अनुमन्य मकान किराया भत्ते का हकदार होगा।
(8) अध्यक्ष राज्य सरकार के खर्चे पर स्टाफ कार का हकदार होगा और प्रत्येक सदस्य छः सौ रूपये प्रतिमाह के वाहन भत्ते का हकदार होगा।
(9) अध्यक्ष या सदस्य उत्तर प्रदेश मेडिकल अटेण्डेन्स रूल्स 1946 और इस निमित समय-समय पर जारी राज्य सरकार के आदेशों में यथा उपबिन्धत चिकित्सीय उपचार और अस्पताल सुविधाओं का हकदार होगा।
(10) अध्यक्ष या सदस्य की सेवा की शर्ते जिसके लिये इस नियमावली में स्पष्ट उपलब्ध नहीं है, उस सेवा पर जिससे वह अपनी नियुक्ति के ठीक पूर्व सम्बन्धित था या राज्य सरकार के समूह क के अधिकारियों पर तत्सय प्रवृत्त नियमों और आदेशों जो भी उसके लिये अधिक लाभप्रद हो, द्वारा अवधारित की जायेगी।
1[255. (क) न्यायाधिकरण का अध्यक्ष या सदस्य अपना पद धारण करने के दिनांक से छः वर्ष की अवधि के लिये पद धारण  करेगा
प्रतिबन्ध यह है कि छाछठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात् कोई अध्यक्ष या सदस्य उस रूप में पद धारण नहीं करेगा।
2[(ख) खण्ड (क) में किसी बात के होते हुए भी राज्य सरकार न्यायाधिकरण के अध्यक्ष या सदस्य के कार्यकाल में, चाहे वह उत्तर प्रदेश सहकारी समिति (उन्तालिसवां संशोधन) नियमावली 2001 के प्रारम्भ के पूर्व या उसके पश्चात् नियुक्त किया गया हो छः वर्ष के आगे भी विस्तार कर सकती है, किन्तु कोई ऐसा व्यक्ति अड़सठ साल की आयु प्राप्त कर लेने पश्चात् अध्यक्ष अथवा सदस्य के पद पर नहीं बना रह सकेगा।
 

(c) No officer shall be appointed or shall continue as the Chairman or the member of the Tribunal if he is or becomes the Chairman, Vice Chairman or the member of the Tribunal if he is or becomes the Chairman, Vice-Chairman or a member of the committee of management of any co-operative society.


256. किसी न्यायाधिकरण का मुख्यालय ऐसे स्थान पर होगा जो राज्य द्वारा गजट में विज्ञापित किया जाये।
प्रतिबन्ध यह है कि न्यायाधिकरण, विवाद के पक्षों की सुविधा के लिये विवाद के निस्तारण के लिये अपनी बैठकें राज्य में किसी अन्य स्थान पर करने का निश्चय कर सकता है।
257. (क) अपील ज्ञापन पत्र, राज्य सरकार, न्यायाधिकरण या निबन्घक को अपीलार्थी या उसके यथाविधि प्राधिकृत एजेन्ट द्वारा या तो कार्यालय समय से स्वयं दिया जायेगा या अभिस्वीकृति के अन्तर्गत रजिस्ट्री डाक द्वारा भेजा जायेगा।
(ख) प्रत्येक अपील के ज्ञापन-पत्र के साथ ऐसे आदेश निर्णय या अभिनिर्णय की जिसके विरूद्ध अपील प्रस्तुत की गयी हो, एक प्रमाणित प्रति होगी और उसके साथ अपील के ज्ञापन पत्रों की उतनी प्रतियां होंगी जितने पक्ष हों।
(ग) किसी अपील का ज्ञापन पत्र -
(1) या तो टाइप किया हुआ अथवा स्याही से लिखा हुआ सुपाठ्य होगा
(2) उसमें अपीलार्थियों या अपीलार्थियों के नाम और पता या पते होंगे और विरूद्ध पक्ष का या पक्षों के जैसी भी दशा हो नाम और पता या पते होंगे।
(3) उस प्राधिकारी का उल्लेख किया जायेगा जिसके द्वारा ऐसा अभिनिर्णय आदेश या निर्णय किय गया या दिय था, जिसके विरूद्ध अपील प्रस्तुत की गई है,
(4) उनमें उन कारणों को स्पष्ट रूप से दे दिया जायेगा जिन पर अपील प्रस्तुत की गई है।
(5) उनमें ऐसा अनुतोष जिसके लिये दावा किया गया है, को ठीक-ठीक लिखा जायेगा।
(6) उनमें ऐसे आदेश, निर्णय या अभिनिर्णय का दिनांक जिके विरूद्ध अपील की गई हो, अपीलार्थी को ऐसा आदेश, निर्णय या अभिनिर्णय संसूचित किये जाने का दिनांक भी लिखा जायेगा।
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1. अधिसूचना सं0 1229/49-1-7-2001-7(1)-97 टी0सी0 दिनांक 19 अप्रैल 2001 द्वारा संशोधित।
2. अधिसूचना सं. 90 सी0एम0/49-1-2002-7(11)-97 टी0सी0 दिनांक 6 जून 2002 द्वारा प्रतिस्थपित।

1[257 क (1) जहां किसी वाद में कोई आवेदन पत्र या दस्तावेज ऐसे दिवस को दाखिल किया जाये
(क) जब वाद सुनवाई के लिये नियत न हो, तो आवेदन पत्र या दस्तावेज ऐसे कर्मचारी द्वारा प्राप्त किया जायेगा जो इस निमित्त अध्यक्ष द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाये।
(ख) जब वाद सुनवाई के लिये नियत हो तो आवेदन पत्र न्यायाधिकरण के रीडर द्वारा प्राप्त किया जायेगा।
(2) समस्त लम्बित अपीलों के अभिलेख इस सम्बन्ध में अध्यक्ष द्वारा पदभिहित एक कर्मचारी द्वारा कार्यालय में रखे और अनुरक्षित किये जायेंगे। वह किसी भी दिवस सुनवाई के लिये नियत समस्त अपीलों के अभिलेखों को उस दिन की पूर्ववर्ती शाम को रीडर को भेजने के लिये उत्तरदायी होगा। इसी प्रकार रीडर अभिलेखों के अनुरक्षण के लिये अध्यक्ष द्वारा पदभिहित व्यक्ति को किसी दिन  के लिये नियत अपीलों के समस्त अभिलेखों को उस दिन की शाम को अध्यक्ष द्वारा पदभिहित वापस भेज देगा।
(3) न्यायाधिकरण का सचिव समस्त नई अपीलों को प्राप्त करेगा उस अपील पर, जैसा विहित किया जाये पृष्ठांकन रिपोर्ट करेगा, और उसे अध्यक्ष के समक्ष उनके आदेश प्राप्त करने के लिये विलम्बतम अगले दिन प्रस्तुत करेगा। तब अभिलेखों को अभिलेख के अनुरक्षण के लिये अध्यक्ष द्वारा पदाभिहित कर्मचारी को कार्यालय को भेजा जायेगा।
(4) रीडर या अभिलेखों के अनुरक्षण के लिये अध्यक्ष द्वारा पदाभिहित कार्यालय का कर्मचारी लम्बित अपीलों में किसी आवेदन पत्र के प्राप्त होने पर आवेदन पत्र/दस्तावेज पर सूचक पत्र के अनुसार यथास्थिति क या ख अक्षर के पूर्व क्रम संख्या डालेगा और अक्षर क या ख के साथ यह क्रम संख्या उसके द्वारा सूचक पत्र में लिखी जायेगी क या ख अंकित दस्तावेज यथास्थिति नत्थी क या नत्थी ख में रखा जायेगा।
निम्नलिखित दस्तावेज नत्थी क में रखे जायेंगे -
(क) अभिलेखों का सूचक पत्र (विहित प्रपत्र में)
(ख) फर्द अहकाम
(ग) अपील का ज्ञापन
(घ) आदेश/अभिनिर्णय की प्रति जिसके विरूद्ध अपील की गयी है
(ड) पक्षकारों द्वारा दाखिल किये गये दस्तावेज
(च) उच्चतर न्यायालयों के आदेश/निर्णयों, यदि कोई हो
(छ) न्यायाधिकरण का निर्णय
(ज) अध्यक्ष या सदस्यों द्वारा महत्वपूर्ण और सदैव मूल्यवान समझा जाने वाला कोई अन्य दस्तावेज।
अभिलेख के समस्त अन्य दस्तावेज नत्थी ख में रखे जायेंगे।
नत्थी क के दस्तावेज स्थायी अभिलेख होंगे और उन्हें नष्ट नहीं किया जायेगा। नत्थी ख के दस्तावेजों को अभिलेखपाल द्वारा न्यायाधिकरण के निर्णय के दिनांक से छः वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नष्ट कर दिया जायेगा और अभिलेखपाल सूचक पत्र में लाल स्याही में एक टिप्पणी अंकित करेगा कि नत्थी ख को कब नष्ट किया गया, उस पृष्ठांकन पर हस्ताक्षर करेगा और अपनी मुहर लगायेगा और तब उसे न्यायाधिकरण के सचिव के समक्ष उसके प्रतिहस्ताक्षर के लिये प्रस्तुत करेगा।
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1. नियम 257 क से 257 घ तक अधिसूचना सं0 1884/49-1-1995-7(10), दिनांक 5.6.1995 द्वारा बदला गया।
प्रतिबन्ध यह है कि किसी वाद में रिट याचिका लम्बित हो, तो उस वाद के अभिलेख को नष्ट नहीं किया जायेगा जब तक कि रिट याचिका लम्बित हों,
257 ख. रखे जाने वाली पंजियां न्यायाधिकरण के अध्यक्ष द्वारा विहित की जायेगी।
257 ग. न्यायाधिकरण के समस्त कर्मचारियों को कार्य न्यायाधिकरण के अध्यक्ष द्वारा वितरित और समनुदेशित किये जायेंगे।
257 घ. प्रत्येक स्थगन के आवेदन पत्र पर केवल तीन रूपये का न्यायालय फीस स्टाम्प लगाया जायेगा। न्यायाधिकरण में लम्बित किसी वाद में दिये गये किसी अन्य आवेदन पत्र पर। रूपये 50 पैसे का न्यायालय फीस स्टाम्प लगाया जायेगा।
258. अपील का ज्ञापन पत्र प्राप्त होने पर अपीलीय प्राधिकारी उस पर प्राप्ति का दिनांक भी लिखेगा। अपीलीय प्राधिकारी यथाशक्य शीध्र उसकी परीक्षा करेगा और अपना यह समाधान करेगा कि -
(1) उसे प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति को ऐसा करने का प्राधिकार है
(2) वह नियत कालाविधि के भीतर की गई है, और
(3) वह अधिनियम तथा नियमों के उपबन्धों के अनुरूप है।
259. नियम 258 और 260 के अधीन कालावधि की गणना करने में लिमिटेशन्स ऐक्ट 1963 (ऐक्ट संख्या 36, 1963) की धारा 5 और 12 के उपबन्ध लागू होंगे।
260. यदि अपीलीय प्राधिकारी को यह प्रतीत हो कि प्रस्तुत की गई अपील अधिनियम या नियमों के संगत उपलब्धों के अनुरूप नहीं है तो वइ इस आशय की एक टिप्पणी लिखेगा और अपीलार्थी से निर्दिष्ट अवधि के भीतर दोषों को दूर करने के लिये कह सकता है, या यदि यह प्रतीत हो कि अपील नियत कालावधि के भीतर या जो ऐसा करने में सक्षम हो उस व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत नहीं की गई हो तो उससे निर्दिष्ट समय के भीतर यह कारण बताने के लिये कहेगा कि क्यों न यह अस्वीकृत कर दी जाये।



टिप्पणी


इस नियम के अधीन अपील मर्यादा (Limitation) के आधार पर तब तक खारिज नहीं की जा सकेगी जब तक कि अपीलार्थी को इस बात का युक्तियुक्त अवसर न प्रदान कर दिया गया हो कि वह हेतु संदर्शित करे कि अपील विहित अवधि के भीतर क्यं नहीं दाखिल की गई। अतः अपील अधिकारी के लिये यह जरूरी है कि वह अपीलार्थी को यह हेतु संदर्शित करने का अवसर प्रदान करे कि अपील मर्यादा के आधार पर क्यों न खारिज कर दी जाये। यदि अपील मर्यादा के आधार पर अपीलार्थी को विलम्ब का कारण दिखाये जाने का अवसर प्रदान किये गये बिना ही खारिज कर दी जाती है तो ऐसा आदेश नियम 260 के उपबन्धों के उल्लंघनकारी होगा।
261. (क) यदि अपीलीय प्राधिकारी द्वारा इंगित दोष दूर दिये जाये अथवा अपीलार्थी कारण बताने की नोटिस का स्पष्टीकरण अपीलीय प्राधिकारी के समाधानानुसार दे दे, तो उक्त प्राधिकारी सुनवाई के लिये अपील ग्रहण कर सकता है।
(ख) यदि अपीलार्थी समाधान न कर सके कि अपील नियत कालावधि के भीतर या जो ऐसा करने में सक्षम हो उस व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत की गई अथवा इंगित दोषों के निर्दिष्ट अवधि के भीतर दूर न कर सके तो अपील अस्वीकृत की जा सकती है।
262. यदि अपील ग्रहण कर ली जाये तो अपीलीय प्राधिकारी सुनवाई के लिये कोई दिनांक निश्चित करेगा और इस प्रकार निश्चित दिनांक की सूचना अपीलार्थी को देगा। इस प्रकार निश्चित दिनांक की सूचना, अपील के ज्ञापन पत्र की प्रति के साथ दूसरे पक्ष या पक्षों को भी भेजी जायेगी। उक्त सूचना अभिस्वीकृति के अन्तर्गत रजिस्टर्ड डाक द्वारा या ऐसे अन्य प्रकार से भेजी जायेगा जिसे अपीलीय समुचित समझे।
263. अपीलीय प्राधिकारी अपील सुनवाई के लिये निश्चित दिनांक को अभिलेख देखेगा और विवाद के पक्षों या उनके प्राधिकृत एजेन्टों को सुनेगा और अपील पर ऐसा आदेश देगा जो अपीलीय प्राधिकारी ठीक समझे। ऐसे दिये गये आदेश में, वे कारण दिये जायेंगे जिन पर निर्णय आधारित हो और उसमें व्यय, यदि कोई हो, और ब्याज के सम्बन्ध में भविष्य ब्याज सहित यदि कोई हो, भी आदेश देगा और उसमें अपील की संख्या या पक्षों के नाम और उनक विवरण भी होंगे।
264. अपीलीय प्राधिकारी अपने विवेकानुसार किसी स्तर पर किसी अपील की सुनवाई किसी अन्य दिनांक के लिये स्थगित कर सकता हैं
265. अपीलीय प्राधिकारी का प्रत्येक निर्णय या आदेश लिखित होगा।
266. धारा 99 की उपधारा (1) के अधीन पुनर्विलोकन के लिये प्रार्थना पत्र के साथ उस आदेश की, जिसका पुनर्विलोकन किया जाना हो, मूल या प्रमाणित प्रति भी होगी। उक्त प्रार्थना पत्र के साथ उतनी अतिरिक्त प्रतियां होगी जितने पक्ष पुनर्विलोकन किये जाने वाले आदेश में हो।
267. पुनर्विलोकन का प्रार्थना पत्र अपील प्राधिकारी द्वारा जह तक आवश्यक हो, ऐसी रीति से निस्तारित किया जायेगा जो वह उचित समझे
प्रतिबन्ध यह है कि किसी पक्ष के प्रतिकूल कोई आदेश तब तक नहीं दिया जायेगा जब तक कि उसे प्रत्यावेदन करने का और यदि आवश्यक हो तो सुनवाई का भी अवसर न दे दिया जाये।
268. अपीलीय अधिकारी के कार्मिक में कोई परिवर्तन होने से निम्नलिखित के सम्बन्ध में उत्तराधिकारी के अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पडे़गा -
(1) परिवर्तन होने से पहले विचाराधीन अथवा आंशिक रूप से सुनी गई ऐसी अपील का निस्तारण।
(2) परिवर्तन होने से पूर्व किसी मामले में दिये गये आदेश पर पुनर्विचार करना।

269. निबन्धक, मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल द्वारा दिये गये आदेश, निर्णय अभिनिर्णय मे अथवा अपीलीय प्राधिकारी द्वारा दिये गये आदेशों मे कोई लिपिक अथवा अशं सम्बन्धी त्रुटिया अथवा उक्त आदेशो (जिसके अन्तर्गत अपीलीय प्राधिकारी  का आदेश भी सम्मिलित है) निर्णयो या अभिनिर्णयो मे होने वाली ऐसी अशुद्धिया जो किसी आकस्मिक चूक से या अकृत से हो जाये, किसी भी समय, सम्बद्ध प्राधिकारी द्वारा या स्वतः अथवा विवाद के किसी पक्ष द्वारा प्रार्थना-पत्र दिये जाने पर ठीक की जा सकती है।