अध्याय 18
विवादों का निपटारा


225. जब धारा 70 की उपधारा (1) में अभिदिष्ट किसी समय से सम्बन्धित विवाद उत्पन्न हो तो क्षुब्ध पक्ष निबन्धक द्वारा इस प्रयोजन के लिये निय प्रपत्र पर यदि कोई हो निबन्धक को प्रार्थना पत्र दे सकता है जिसमें वह विरूद्ध पक्ष या पक्ष के नाम तथा पते उल्लिखित करने के अतिरिक्त विवाद का सार और दावा उल्लिखित करेंगाः यदि उक्त पक्ष विवाद की धारा 71 की उपधारा (1) के खण्ड (ग) के अधीन मध्यस्थ मण्डल द्वारा निर्णीत कराना चाहे तो वह प्रार्थना पत्र में मध्यस्थ मण्डल के लिये अपने नामनिर्दिष्ट व्यक्ति का नाम भी उल्लिखित करेगा।
226. यदि नियम 225 में अभिदिष्ट प्रार्थना पत्र से यह विदित हो कि प्रार्थी विवाद को मध्यस्थ मण्डल द्वारा निर्णीत कराना चाहता है तो निबन्धक प्रार्थना पत्र में दिये गये पते या पतों पर विरूद्ध पक्ष या पक्षों को रजिस्ट्री डाक से इस आशय की नोटिस देगा जिसमें सम्बद्ध पक्ष या पक्षों को नोटिस की प्राप्ति के दिनांक से तीस दिन के भीतर मध्यस्थ मण्डल के लिये नाम निर्दिष्ट व्यक्ति का नाम सूचित करने के लिये कहा जायेगा।
स्पष्टीकरण -यदि एक से अधिक विरूद्ध पक्ष हों तो उन सबसे यह अपेक्षा की जायेगी कि वे सब मिलकर मण्डल के लिये एक नाम निर्दिष्ट व्यक्ति चुने।
227. यदि नियम 226 में निर्दिष्ट नोटिस की अवधि के भीतर निबन्धक को विरूद्ध पक्ष या पक्षों द्वारा नाम निर्दिष्ट व्यक्ति का नाम प्राप्त न हो या विरूद्ध पक्ष अथवा किसी एक विरूद्ध पक्ष के इस आशय की सूचना प्राप्त हो कि विवाद को मध्यस्थ मण्डल द्वारा निर्णीत कराना वांक्षित नहीं है अथवा सब विरूद्ध पक्ष एक व्यक्ति के नाम निर्देशन पर सहमत न हों तो निबन्धक या तो विवाद का निपटारा स्वयं कर सकता है अथवा उसका निर्णय करने के लिए कोई मध्यस्थ नियुक्त कर सकता है।
228. यदि विवाद के पक्षों ने यह इच्छा व्यक्त की हो कि विवाद मध्यस्थ मण्डल द्वारा निर्णीत कराया जाये और उनके नामनिर्दिष्ट व्यक्तियों के नाम नियम 226 में निर्दिष्ट अवधि में भीतर प्राप्त हो जाये तो निबन्धक तीसरे सदस्य के रूप में एक व्यक्ति का नाम निर्दिष्ट करेगा जो उक्त मण्डल के अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा।
229. (1) यदि विवाद सम्पत्ति या धनराशि के दावे से सम्बन्धित हो तो अभिदेश --
(क) जिला सहायक निबन्धक को किया जायेगा, यदि अन्तर्ग्रस्त सम्पत्ति का मूल्य या दावे की धनराशि पच्चीस हजार रूपये से अधिक न हो:
प्रतिबन्ध यह है कि यदि विवाद एक ही डिवीजन के एक से अधिक जिलों के दो या अधिक सहकारी समितियों के बीच हो तो अभिदेश, यथास्थिति, डिवीजन के उप निबन्धक या संयुक्त निबन्धक को किया जायेगा।
अग्रेत्तर प्रतिबन्ध यह है कि यदि विवाद विभिन्न डिवीजनों के एक से अधिक जिलों के दो या उससे अधिक सहकारी समितियों के बीच हो तो अभिदेश रीजन के क्षेत्राधिकारयुक्त अपर निबन्धक को किया जायेगा।
प्रतिबन्ध यह भी है कि विवाद एक से अधिकारी अपर निबन्धकों के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत रीजनों में दो या उससे अधिक सहकारी समितियों के बीच हो तो, अभिदेश धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त निबन्धक, सहकारी समितियों को किया जायेगा।
(ख) यथास्थिति डिवीजन के उप निबन्धक  या संयुक्त निबन्धक को किया जायेगा यदि विवाद में अन्तर्ग्रस्त सम्पत्ति का मूल्य या दावे की धनराशि पच्चीस हजार रूपये से अधिक किन्तु पचास हजार रूपये से अधिक न हो:
प्रतिबन्ध यह है कि यदि विवाद अधिक डिवीजनों के जिलों की दो या उससे अधिक सहकारी समितियों के बीच हो तो अभिदेश सम्बन्धित रीजन की क्षेत्राधिकारयुक्त अपर निबन्धक को किया जायेगा।
अग्रेत्तर प्रतिबन्ध यह है कि यदि विवाद से एक अधिक अपर निबन्धकों के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत रीजनों में दो या उससे अधिक सहकारी समितियों के बीच हो तो अभिदेश धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त निबन्धक, सहकारी समितियों को किया जायेगा।
(ग) सम्बन्धित रीजन के क्षेत्राधिकारयुक्त अपर निबन्धक का किया जायेगा यदि विवाद में अन्तर्ग्रस्त सम्पत्ति का मूल्य या दावे की धनराशि पचास हजार रूपये से अधिक किन्तु तीन लाख रूपये से अधिक न हो।
प्रतिबन्ध यह है कि विवाद एक से अधिक अपर निबन्धकों के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत रीजनों में दो या उससे अधिक सहकारी समितियों के बीच हो तो अभिदेश धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त निबन्धक सहकारी समिति को किया जायेगा।
(घ) यदि अभिदेश धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त निबन्धक, सहकारी समितियों को किया जायेगा तो विवाद में अन्तर्ग्रस्त सम्पत्ति का मूल्य या दावे की धनराशि तीन लाख रूपये से अधिक हो।
(2) यदि विवाद प्रबन्ध कमेटी के संगठन या किसी सहकारी समिति कि किसी पदाधिकारी या प्रतिनिधि के निर्वाचन या नियुक्ति से सम्बन्धित हो तो अभिदेश -
(क) किसी शीर्ष सहकारी समिति की दशा में धारा 3 की उपधारा (1) के अघीन नियुक्त निबन्धक को किया जायेगा।
(ख) किसी शीर्ष समिति से भिन्न किसी सहकारी समिति की दशा में उस जिले के जिसकी समिति हो जिला मजिस्ट्रेट को किया जायेगा।
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1. अधिसूचना सं0 3849/49-1-98-7(11)-97 लखनऊ दिनांक 31 अक्टूबर 1998 द्वारा प्रतिस्थापित हुआ।


(3) यदि विवाद उपनियम (1) या उपनियम (2) के अधीन आने वाले किसी विषय के सम्बन्ध में न हो तो अभिदेश, यथास्थिति, डिवीजन के उप निबन्धक या संयुक्त निबन्धक को किया जायेगा।
प्रतिबन्ध यह है कि यदि विवाद विभिन्न डिवीजनों के जिलों की दो या उससे अधिक सहकारी समितियों के बीच हो तो अभिदेश सम्बन्धित रीजन के क्षेत्राधिकारयुक्त अपर निबन्धक को किया जायेगा।
प्रतिबन्ध यह और है कि यदि विवाद एक से अधिक अपर निबन्धकों के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत रीजनों में दो या उससे अधिक सहकारी समितियों के बीच हो तो अभिदेश धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त निबन्धक सहकारी समिति को किया जायेगा।
230. नियम 229 के अधीन अभिदेश प्राप्त होने पर -
(क) जिला सहायक निबन्धक विवाद का निर्णय स्वयं कर सकता है अथवा यथास्थिति, किसी मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल के अध्यक्ष को इसके लिये नियुक्त कर सकता है, किन्तु शर्त यह है कि -
(एक) यदि विवाद में अन्तर्ग्रस्त सम्पत्ति का मूल्य या दावे की धनराशि दस हजार रूपये से अधिक न हो, तो यथास्थिति मध्यस्थ मण्डल के अध्यक्ष को इसके लिये नियुक्त का अध्यक्ष वह होगा जो निरीक्षक, सहकारी समिति वर्ग-दो की श्रेणी से नीचे का न हो या जो निरीक्षक सहकारी समिति वर्ग-दो के पद से सेवा निवृत्त हुआ हो,
(दो) यदि विवाद में अन्तर्ग्रस्त सम्पत्ति का मूल्य या दावे की धनराशि दस हजार रूपये से अधिक किन्तु पच्चीस हजार रूपये से अधिक न हो तो यथास्थिति मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल का अध्यक्ष वह होगा,जो निरीक्षक सहकारी समिति वर्ग ए की श्रेणी से नीचे का न हो, या निरीक्षक सहकारी समिति वर्ग एक के पद से सेवा निवृत्त हुआ हो।
2[(ख) डिवीजन के उप निबन्धक या संयुक्त निबन्धक यथास्थिति, विवाद का निर्णय स्वयं कर करता है, अथवा यथास्थिति किसी मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल के अध्यक्ष को इसके लिये नियुक्त कर सकता है जो राज्य सरकार के समूह ख के किसी राजपत्रित अधिकारी की श्रेणी से निम्न श्रेणी का न हो या जो राज्य सरकार के समूह ख के राजपत्रित अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुआ हो,
(ग) अपर निबन्धक का स्वयं निर्णय कर सकता है अथवा यथास्थिति किसी मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल के अध्यक्ष को इसके लिये नियुक्त कर सकता है, जो राज्य सरकार के समूह क के राजपत्रित अधिकारी की श्रेणी से निम्न श्रेणी का न हो या जो राज्य सरकार के समूह क राजपत्रित अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुआ हो,
प्रतिबन्ध यह है कि यदि विवाद नियम 229 के उपनियम (2) के अन्तर्गत आता हो तो, यथास्थिति, मध्यस्थ या मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल का अध्यक्ष उस विवाद से सम्बन्धित शीर्ष सहकारी समिति के प्रशासन या पर्यवेक्षण से सम्बन्धित विभाग का कार्यरत अधिकारी न होगा।
(घ) धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त किया गया निबन्धक, सहकारी समिति विवाद का निर्णय स्वयं कर सकता है अथवा यथास्थिति मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल का अध्यक्ष इसके लिये नियुक्त कर सकता है जो अपर निबन्धक की श्रेणी से निम्न श्रेणी का अधिकारी न हो या जो अपर निबन्धक सहकारी समितियां, उ0प्र0 के पद से सेवानिवृत्त हुआ हो।

1. अधिसूचना संख्या 2700/49-1-94-7(1)-94 दिनांक 15.07.94 द्वारा बदला गया
2. अधिसूचना संख्या 3849/49-1-98-7(11)-97 लखनऊ दिनांक 31 अक्टूबर 1998 द्वारा प्रतिस्थापित हुआ।

(ड़) जिला मजिस्ट्रेट विवाद का निर्णय स्वयं कर सकता है अथवा अपने अधीन परगना अधिकारियों में से किसी एक को यथास्थिति मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल के अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिये नियुक्त कर सकता है।
231. यदि यह प्रश्न उठे कि जिस प्राधिकारी के समक्ष विवाद विचारधीन है उसे विवाद को निपटाने के लिये क्षेत्राधिकार प्राप्त है या नही तो उस प्रश्न का निर्णय धारा 70 की उपधारा (3) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना और अपील करने के अधिकार को प्रभावित किये बिना उसी प्राधिकारी द्वारा किया जायेगा।
232. नियम 330 के अधीन मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल के अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिये नियुक्त किये गये सेवा निवृत्त सरकारी कर्मचारी को दिया जाने वाला शुल्क वह होगा जो राज्य सरकार के किसी सामान्य या विशेष आदेश के अधीन रहते हुये, निबन्धक द्वारा निश्चत किया जाये।
233. यदि धारा 71 के अधीन किसी विवाद के विचाराधीन रहते समय उक्त विवाद से सम्बन्धित पक्ष के किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाये तो यथास्थिति निबन्धक या मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल के अध्यक्ष तदर्थ प्रार्थना पत्र देने पर, मृत व्यक्ति का नाम निर्दिष्ट व्यक्ति दायाद या विधिक प्रतिनिधि के नाम को एक पक्ष के रूप में प्रतिस्थापित कर सकता है और ऐसे प्रतिस्थापित व्यक्ति को नये सम्मन जारी करने का आदेश दे सकता है। यदि नाम निर्दिष्ट व्यक्ति दायाद या विधिक प्रतिनिधि आवश्यक हो, तो निबन्धक अथवा मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल के अध्यक्ष उसकी आवश्यकता के बारे में समाधान हो जाने पर, किसी व्यक्ति को उस मामले के लिये सिविल प्रक्रिया संहिता (कोड आफ सिविल प्रोसीजर 1908) (ऐक्ट संख्या-5, 1908) के अधीन व्यवस्थित रीति से उसका अभिभावक नियुक्त करेगा। यदि किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में यह प्रश्न उठे कि वह मृत व्यक्ति का विधिक प्रतिनिधि है यह नही तो ऐसे प्रश्न को अवधारण निबन्धक अथवा यथास्थिति मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल के अध्यक्ष के द्वारा किया जायेगा।
234. यदि मध्यस्थ मण्डल के किसी मध्यस्थ की मृत्यु हो जाये या वह अक्षम हो जाये अथवा समुचित कारणों के बिना उपस्थित न हो या मध्यस्थ का कार्य करने से इन्कार करे तो मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल के अध्यक्ष ऐसे मामले को निबन्धक को अभिदिष्ट करेगा जो धारा 71 की उपधारा (2) के अधीन की गई व्यवस्था के अनुसार कार्यवाही करेगा।
235. विवाद से सम्बन्धित कोई भी पक्ष जो निबन्धक या मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल के अध्यक्ष से किसी साक्षी की उपस्थिति के लिये सम्मन जारी करने की अपेक्षा करें, अग्रिम रूप से ऐसे परिव्यय जमा करेगा, जिसके लिये ऐसी उपस्थिति को सुनिश्चित करने के लिये निमित्त निबन्धक, मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल के अध्यक्ष द्वारा जैसी भी दशा हो, निदेश दिया जाये।
236. निबन्धक मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल के अध्यक्ष जैसी दशा हो, विवाद का निर्णय करने के प्रयोजनार्थ सुनवाई का/से दिनांक, समय तथा स्थान निश्चित करेगा।
237. (क) जारी किये गये सम्मन लिखित होंगे और उस अधिकारी की जिसके द्वारा वह जारी किया जाये, मुहर से, यदि कोई हो, प्रमाणित किये जायेंगे और ऐसे प्राधिकारी द्वारा या उसके द्वारा तदर्थ लिखित रूप में प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उस पर हस्ताक्षर किये जायेंगे। उसमें उस व्यक्ति से जिसे सम्मन जारी किया गया हो, उक्त प्राधिकारी के समक्ष निश्चित समय तथा स्थान पर उपस्थिति होने की अपेक्षा की जायेगी और उसमें यह भी निर्दिष्ट होगा कि क्या उसकी उपस्थिति साक्ष्य देने या कोई लेख्य प्रस्तुत करने अथवा दोनों प्रयोजनों के लिये अपेक्षित है। प्रत्येक विशेष लेख्य का जिससे उक्त प्रयोजनों के लिये प्रस्तुत करने की अपेक्षा की गयी हो, सम्मन में ठीक-ठीक वर्णन किया जायेगां।
(ख) किसी भी व्यक्ति को साक्ष्य देने के लिये बुलाये बिना, कोई लेख्य प्रस्तुत करने के लिये बुलाया जा सकता है और किसी भी व्यक्ति के सम्बन्ध में जिसे केवल साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिये बुलाया जाये यह समझा जायेगा कि उसने सम्मन का अनुपालन कर दिया है, यदि वह ऐसे लेख्य को स्वयं प्रस्तुत करने के बजाय उसे प्रस्तुत करा दे।
(ग) सम्मन -
(1) (प्राप्य अभिस्वीकृति के अन्तर्गत) रजिस्ट्रीकृत डाक द्वारा या
(2) समिति के सचिव या वित पोषण अथवा पर्यवेक्षण समिति के कर्मचारी वर्ग के किसी सदस्य के माध्यम के व्यक्तिगत रूप से देकर तामील किया जा सकता है।
(ध) यदि उपनियम (1) में निर्दिष्ट किसी भी प्रकार से सम्मन तामील न किया जा सके तो उसे सिविल प्रक्रिया संहिता (कोड आफ सिविल प्रोसीजर, 1908) (ऐक्ट संख्या-5, 1908) में व्यवस्थित किसी भी प्रकार से तामील किया जा सकता है।
238. किन्तु समिति के सभापति या सचिव पर सम्मन की तामील उक्त समिति पर तामीली समझी जायेगी।
239. सम्मन या नोटिस की तामीली पर्याप्त रूप से की गई है या नहीं इसका निर्णय सम्मन जारी करने वाले प्राधिकारी द्वारा किया जायेगा।
1[240. मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल निबन्धक द्वारा निश्चित समय के भीतर जो तीन माह से अधिक न होगा अभिनिर्णय देगा, ऐसा न होने पर निबन्धक यथास्थिति मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल के अनुरोध पर या तो समय बढ़ा सकता है जो तीन मास से अधिक न होगा या धारा 71 की उपधारा (2) के अधीन की गई व्यवस्था के अनुसार कार्यवाही कर सकता है।
प्रतिबन्ध यह है कि इस प्रकार नियुक्त मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल अधिकतम तीन माह अथवा वह अवधि जो निबन्धक द्वारा निश्चित की गयी हो, परन्तु जो छः माह से अधिक न होगी, में अभिनिर्णय देगा।
अग्रेत्तर प्रतिबन्ध यह है कि कोई भी अभिनिर्णय निश्चित समय की समाप्ति के पश्चात् दिये जाने के कारण अवैध न होगा यदि समय बढ़ाने का प्रार्थना पत्र बाद में भी दे दिया जाये और वह निबन्घक द्वारा स्वीकृत कर लिया जाये।
241. किसी विवाद पर निर्णय देते समय निबन्धक, मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल का अध्यक्ष पक्षों या साक्षियों के साक्ष्य की एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखेगा और पक्षों द्वारा प्रस्तुत किसी लेख्य या मौलिक साक्ष्य पर विचार करने के पश्चात् न्यास, साम्य और शुद्ध अन्तःकरण के अनुसार अभिनिर्णय देगा। कार्यवाहियों में दिया गया प्रत्येक आदेश तथा अभिनिर्णय लिखित होगा।
2[242. यदि विवाद का कोई पक्ष यथाविधि सम्मन तामील किए जाने के पश्चात् भी अनुपस्थित रहे तो विवाद पर एक पक्षीय निर्णय दिया जा सकता है, किन्तु यदि प्रतिवादी यथास्थिति निबन्धक,  मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल या अपीलीय अधिकारी के समक्ष एक पक्षीय अभिनिर्णय या आदेश को इस आधार पर निरस्त करने की प्रार्थना करता है कि सम्मन उसके ऊपर सम्यक, रूप से तामील नहीं हुआ है, और जिसके लिये वह साक्ष्य देता है तो एक पक्षीय अभिनिर्णय या आदेश किसी या सभी प्रतिवादियों के सन्दर्भ में सम्बन्धित प्राधिकारी की संतुष्टि के बाद रदद् किया जायेगा और एक दिनांक निश्चित किया जायेगा जिस पर मामले की सुनवाई पुनः प्रारम्भ होगी किन्तु विवाद के निस्तारण हेतु अवधि की गणना सुनवाई के पुनः प्रारम्भ होने के दिनांक से की जायेगी।
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1. अधिसूचना संख्या-2700/49-1-97-7(1)-94 दिनांक 15.7.94 द्वारा बदला गया।
2. अधिसूचना संख्या-2700/49-1-97-7(1)-94 दिनांक 15.7.94 द्वारा बदला गया।


प्रतिबन्ध यह है कि एक पक्षीय अभिनिर्णय को रदद् किये जाने हेतु प्रार्थना पत्र नहीं दिया जा सकता यदि एक पक्षीय अभिनिर्णय के विरूद्ध पहले से अपील की गयी हो और वह सिवाय उस आधार पर कि अपीलकर्ता ने उसे वापस ले लिया हो खारिज कर दी गयी हो।
243. यदि विवाद का निर्णय मध्यस्थ मण्डल द्वारा किया जाये तो बहुमत की राय अभिभावी होगी।
244. अभिनिर्णय में कारण दिये जायेंगे जिनके आधार पर निर्णय किया जाये और परिव्यय यदि कोई हो तथा ब्याज जिसके अन्तर्गत भविष्य ब्याज यदि कोई हो, भी है, के सम्बन्ध में आदेश होगा और उसमें अभिदेश की संख्या, पक्षों के नाम तथा विवरण और विवाद के विवरणों का भी उल्लेख होगा।
245. अभिनिर्णय की एक प्रति प्रत्येक पक्ष को भी दी जायेगी जो ऐसी रीति से प्रमाणित तथा मुहर लगी होगी जैसा निबन्धक सामान्य अथवा विशेष आदेश द्वारा निदेश दे।
246. (क) किसी मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल द्वारा दिया गया अभिनिर्णय और विवाद के सभी पत्रादि तथा उसकी कार्यवाहियां यथास्थिति उसके द्वारा या मध्यस्थ मण्डल के अध्यक्ष द्वारा निबन्धक को (जिसने उस मामले में मध्यस्थ या मध्यस्थ मण्डल का अध्यक्ष नियुक्त किया हो) अभिनिर्णय दिये जाने के दिनांक से 15 दिन के भीतर भेजा जायेगा।
(ख) किसी पक्ष द्वारा दिया गया कोई लेख्य या अभिलेख प्रार्थना पत्र देने पर निम्नलिखित दशाओं में उस पक्ष को वापस कर दिया जायेगा -
(1) अपील का निस्तारण यदि कोई हो,
(2) अपील प्रस्तुत करने की अवधि समाप्त हो गयी और कोई अपील की न गई हो।
247. किसी अभिनिर्णय के विरूद्ध धारा 97 या धारा 98 के अधीन कोई अपील तब तक ग्रहण नहीं की जायेगी जब तक कि साथ आत्मनिर्णय की यथाविधि प्रमाणित एक प्रतिलिपि न हो।
248. किसी अभिनिर्णय का निष्पादन केवल इस आधार पर रूका नहीं रहेगा कि अभिनिर्णय के विरूद्ध अपील प्रस्तुत कर दी गई है। अपीलीय प्राधिकारी, अपीलार्थी द्वारा प्रार्थना पत्र दिये जाने पर लिखित आदेश द्वारा अभिनिर्णय के निष्पादन को स्थगित कर सकता हैं
249. कोई पक्ष जो धारा 71 के अधीन दिये गये अभिनिर्णय से क्षुब्ध हो, अभिनिर्णय संसूचित किये जाने के दिनांक से तीस दिन के भीतर उचित अपीलीय प्राधिकारी के पास अपील कर सकता है।
प्रतिबन्ध यह है कि अभिनिर्णय की प्रतिलिपि प्राप्त करने में लगा समय तीस दिन की गणना करते समय निकाल दिया जायेगा।
250. मध्यस्थ कार्यवाहियों में या अपील की कार्यवाहियों में किसी भी पक्ष का प्रतिनिधित्व कोई वकील नहीं करेगा, सिवाय उस दशा के जब किसी अपील का निस्तारण धारा 97 के अधीन व धारा 98 के अधीन न्यायाधिकरण द्वारा किया जा रहा हो।
251. यदि धारा 94 के अधीन किसी सम्पत्ति की कुर्की के विरूद्ध कोई दावा या सम्पत्ति इस आधार पर प्रस्तुत की गई हो कि ऐसी सम्पत्ति की इस प्रकार कुर्की नहीं की जा सकती तो, निबन्धक पक्षों की सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात् गुण-दोषों पर दावा या आपत्ति के सम्बन्ध में निर्णय देगा।
प्रतिबन्ध यह है कि जब दावा या आपत्ति को सारहीन समझा जाये तो उसे सरसरी तौर पर अस्वीकार किया जा सकता है।