धारा-2. परिभाषाएं- जब तक किसी प्रसंग से अन्यथा अपेक्षित न हों, इस अधिनियम में -
(क) मध्यस्थ का तात्पर्य उस व्यक्ति से है जो निबन्धक द्वारा उसको अभिदिष्ट विवादों का निर्णय करने के लिए इस अधिनियम के अधीन नियुक्त किया गया हो;
1[(क-1) कृषि ऋण समिति का तात्पर्य उस ऋण समिति से है जिसके साधारण सदस्यों का बहुमत मुख्यतया कृषि कार्य करता हो,
(क-2) कृषि कार्य के अन्तर्गत निम्नलिखित होगा-
(i) कृषि फसलों का उत्पादन, प्रसंस्करण या क्रय-विक्रय,
(ii) उद्यानकरण, रेशम के कीडे पालना या पशुपालन जिसके अन्तर्गत सुअर पालन, मत्स्य संवर्धन, कुक्कुट पालन और दुग्ध व्यवसाय भी है,
(क-3) कृषि समिति का तात्पर्य उस सहकारी समिति से है जिसके साधारण सदस्यों का बहुमत मुख्यतः कृषि कार्य करता हो,
(क-4) शीर्ष समिति, शीर्ष स्तर समिति या राज्य स्तर सहकारी समिति का तात्पर्य निम्नलिखित से है -
(1) उत्तर प्रदेश सहकारी भूमि विकास बैंक लिमिटेड, लखनऊ,
(2) उत्तर प्रदेश कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड, लखनऊ,
(3) उत्तर प्रदेश कोआपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड, लखनऊ,
(4) प्रादेशिक कोआपरेटिव डेरी फेडरेशन लिमिटेड, लखनऊ,
(5) उत्तर प्रदेश कोआपरेटिव यूनियम लिमिटेड, लखनऊ,
(6) उत्तर प्रदेश उपभोक्ता सहकारी संघ लिमिटेड लखनऊ,
(7) उत्तर प्रदेश कोआपरेटिव शूगर फैक्टरीज फेडरेशन लिमिटेड, लखनऊ,
(8) उत्तर प्रदेश केन यूनियन्स फेडरेशन लिमिटेड, लखनऊ,
(9) उत्तर प्रदेश इन्डस्ट्रियल कोआपरेटिव एसोसियेशन लिमिटेड, कानपुर; या
(10) कोई अन्य केन्द्रीय सहकारी समिति, जो निम्नलिखित शर्तों को पूरा करती है-
(i) उसकी सदस्यता में कम से कम एक ऐसी अन्य केन्द्रीय सहकारी समिति हो जिसका कारोबार या व्यापार उसी प्रकार का हो, और
(ii) उसका कार्यक्षेत्र सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में हो, और
(iii) उसका मुख्य उददेश्य साधारण सदस्यों के रूप में अपने से सम्बद्ध सहकारी समितियों को कार्य करने में सुविधा देना हो,
(ख) मध्यस्थ मण्डल का तात्पर्य उस निकाय से है कि जो निबन्धक द्वारा उसको अभिदिष्ट विवादों का निर्णय करने के लिए इस अधिनियम के अधीन नियुक्त किया गया हो,
(ग) उपविधि का तात्पर्य किसी सहकारी समिति की तत्समय प्रचलित निबन्धित (रजिस्ट्रीकृत) उपविधि से है,
(घ) केन्द्रीय सरकार का तात्पर्य भारतीय संघ की सरकार से है,

2[(घ-1) केद्रीय समिति या केन्द्रीय सहकारी समिति का तात्पर्य उस सहकारी समिति से है जिसका साधारण सदस्य कोई अन्य सहकारी समिति हो और जो प्रारम्भिक सहकारी समिति न हो, ]


1. उ0 प्र0 अधिनियम सं0 12, 1976 के द्वारा बढाये गये (3.10.1975 से प्रभावी)
2. उ0 प्र0 अधिनियम सं0 12, 1976 के द्वारा बढाये गये (3.10.1975 से प्रभावी)


(ड.) प्रबन्ध कमेटी का तात्पर्य किसी सहकारी समिति की ऐसी कमेटी से है चाहे वह किसी भी नाम से पुकारी जाये जिसे धारा 29 के अधीन समिति के कार्यों का प्रबन्ध सौंपा गया हो,
(च) सहकारी समिति का तात्पर्य इस अधिनियम के अधीन निबन्धित या निबन्धित समक्षी जाने वाली किसी समिति से है,
(छ) सीमित दायित्व वाली सहकारी समिति का तात्पर्य ऐसी सहकारी समिति से है, जिसके समापित्त (wound up) होने की दशा से उसके ऋणों के लिए उसके प्रत्येक सदस्य का दायित्व उस समिति की उपविधियों द्वारा निम्नांकित तक सीमित हो-
(1) सदस्यों द्वारा धारित अंशों की शेष धनराशि, यदि कोई हो; अथवा
(2) वह धनराशि, जिसका समिति की परिसम्पत्तियों (assets) में अंशदान देने का दायित्व उन सदस्यों ने लिया हो,
(ज) असीमित दायित्व वाली सहकारी समिति का तात्पर्य ऐसी सहकारी समिति से है जिसके सदस्य, उसके सभापति होने की दशा में, उसके समस्त आधारों के लिए तथा समिति की परिसम्पत्तियों में न्यूनता पाये जाने पर उनमें अंशदान देने के लिए संयुक्त रूप से तथा पृथक-पृथक भी उत्तरदायी हों,
1[(झ) सहकारी वर्ष का तात्पर्य अप्रैल से पहले दिन से प्रारम्भ होकर अगले मार्च के इक्तीसवें दिन समाप्त होने वाले वर्ष में है।]
2[(झ-1) ऋण समिति का तात्पर्य उस समिति से है जिसका मुख्य उददेश्य अपने सदस्यों को उधार देने के लिए निधि एकत्र करना हो]
(ञ) लाभांश का तात्पर्य किसी सहकारी समिति की अंश पूंजी में सदस्यों द्वारा धारित अंशों पर, उस (पूंजी) के लाभ से दिये जाने वाले ब्याज से है, और अंश पूंजी पर दिया जाने वाला बोनस भी उसके अन्तर्गत है,
3[(ञ-1) परिसंघीय संरचना का तात्पर्य ऐसी शीर्ष, केन्द्रीय एवं प्रारम्भिक सहकारी समितियों के समूह से है जो समान प्रकृति का हो और समान व्यवसाय या कार्य करता हो,
4[(ञ-2) परिसंघीय श्रेणी का तात्पर्य किसी विशिष्ट परिसंघीय संरचना की त्रिस्तरीय में से किसी एक श्रेणी अर्थात शीर्ष या केन्द्रीय या प्रारम्भिक सहकारी समितियों से है,
(ट) वित्त पोषण बैंक (financing bank) या केन्द्रीय बैंक का तात्पर्य उस सहकारी समिति से है, जिसका मुख्य उददेश्य उन सहकारी समितियों को रूपया उधार देना है जो उसके सदस्य हैं,
(ठ) परिसमापक का तात्पर्य इस अधिनियम के अधीन निबन्धक द्वारा किसी सहकारी समिति के कार्यों को समापित करने के लिए नियुक्त व्यक्ति से है,
(ड़) अधिकतम दायित्व का तात्पर्य उस अधिकतम धनराशि से है जो किसी सहकारी समिति द्वारा उधार ली जा सकती हो, इसके अन्तर्गत अंशपूजी नहीं है,

1. उ0 प्र0 अधिनियम सं0 4, 1989 द्वारा प्रतिस्थापित।
2. उ0 प्र0 अधिनियम सं0 12, 1976 के द्वारा बढाये गये (3.10.1975 से प्रभावी)।
3. उ0 प्र0 अधिनियम सं0 47, सन 2007 द्वारा खण्ड (ञ-1) और (ञ-2) बढाया गया जो उ0 प्र0 असाधारण गजट भाग-1 खण्ड(क) दिनांक 10 दिसम्बर, 2007 को प्रकाशित हुआ।


4. उ0 प्र0 अधिनियम सं0 47, सन 2007 द्वारा खण्ड (ञ-1) और (ञ-2) बढाया गया जो उ0 प्र0 असाधारण गजट भाग-1 खण्ड(क) दिनांक 10 दिसम्बर, 2007 को प्रकाशित हुआ।
(ढ) सदस्य का तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जो किसी समिति के निबन्धन के लिए दिये गये प्रार्थना पत्र में सम्मिलित हुआ हो अथवा ऐसे व्यक्ति से है जिसे तत्समय प्रचलित अधिनियम, नियम तथा उपविधियों के उपबन्धों के अनुसार ऐसे निबन्धन के पश्चात सदस्य बनाया गया हो, किन्तु इस अधिनियम इस अधिनियम में कहीं पर भी किसी अधिकार के रखने या उसका प्रयोग करने अथवा किसी दायित्व या कर्तव्य के विद्यमान होने या निर्वहन करने के सम्बन्ध में "सदस्य" के निर्देश के अन्तर्गत सदस्यों के किसी वर्ग का निर्देश न होगा जो इस अधिनियम के उपबन्धों के कारण ऐसा अधिकार नहीं रखता या जिसका कोई दायित्व या कर्तव्य न हो,
1[(ढ-1) राष्ट्रीय बैंक का तात्पर्य राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक से है,
(ण) सहकारी समिति का अधिकारी का तात्पर्य अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति, उपसभापति, सचिव प्रबन्धक कमेटी के सदस्य, कोषाध्यक्ष, परिसमापक, प्रशासक अथा किसी अन्य ऐसे व्यक्ति से जो पारिश्रमिक पर अथवा बिना पारिश्रमिक के समिति का कार्य करने अथवा उसके कार्यों का पर्यवेक्षण करने के लिए सहकारी समिति द्वारा नियोजित हो,
(त) साधारण सदस्य का तात्पर्य सहानुभूतिकर सदस्य से भिन्न, सहकारी समिति के ऐसे सदस्य से है जिसका इस अधिनियम, नियम तथा उपविधियों के उपबन्धें के अनुसार समिति कार्यों में मत देने का अधिकार हो,
(थ) निय का तात्पर्य नियमों द्वारा नियत से है,
2[(थ-1) प्रारम्भिक समिति का तात्पर्य उस सहकारी समिति से है, जिसक साधारण सदस्यता किसी अन्य सहकारी समिति के लिए सुलभ न होः
प्रतिबन्ध यह है कि;
(i) किसी सहकारी क्रय-विक्रय समिति को जिसका कार्यक्षेत्र किसी जिले के एक भाग में या एक से अधिक जिले के भाग में हो, प्रारम्भिक समिति समझा जायेगा चाहे उसका साधारण सदस्य कोई अन्य समिति हो या नहीं,
(ii) कोई प्रारम्भिक सहकारी समिति जिसका कोई अंश किसी केन्द्रीय या शीर्ष समिति ने अध्याय 6 के अधीन क्रय किया है, ऐसा अंश क्रय किये जाने पर भी पूर्ववत प्रारम्भिक समिति ही रहेगी,
(iii)  किसी सहकारी समिति को, जिसका कार्यक्षेत्र जिले का केवल एक भाग हो और जिसका मुख्य उददेश्य बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक दवा, कृषि उपकरण या उपभोक्ता माल का संग्रह और अपने साधारण सदस्यों में वितरण करना हो और जिसकी सदस्यता में उसके साधारण सदस्य के रूप में कोई अन्य सहकारी समिति हो प्रारम्भिक समिति समझा जायेगा, भले ही उसके सदस्य अन्य सहकारी समिति हों।)
3(थ-2) रिजर्व बैंक का तात्पर्य भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा-3 के अधीन स्थापित भारतीय रिजर्व बैंक से है]

1. उ0 प्र0 अधिनियम सं0 47, सन 2007 द्वारा खण्ड (ढ-1) बढाया गया जो उ0 प्र0 असाधारण गजट भाग-1 खण्ड(क) दिनांक 10 दिसम्बर, 2007, को प्रकाशित हुआ।
2. उ0 प्र0 अधिनियम सं0 12, सन 1976 के द्वारा बढाये गये (3.10.1975 से प्रभावी)।
3. उ0 प्र0 अधिनियम सं0 47, सन 2007 द्वारा खण्ड (थ-2) बढाया गया जो उ0 प्र0 असाधारण गजट भाग-1 खण्ड(क) दिनांक 10 दिसम्बर, 2007, को प्रकाशित हुआ।


(द) निबन्धक का तात्पर्य धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन सहकारी समितियों के निबन्धक रजिस्ट्रार के रूप में तत्समय नियुक्त व्यक्ति से है तथा इसके अन्तर्गत उक्त धारा की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त ऐसा व्यक्ति भी है जो निबन्धक के सभी या किन्हीं अधिकारों का प्रयोग करे।
(ध) नियम का तात्पर्य इस अधिनियम के अधीन बनाये गये नियमों से है,
(न) राज्य सरकार का तात्पर्य उत्तर प्रदेश सरकार से है,
(प) न्यायाधिकरण का तात्पर्य इस अधिनियम के अधीन संघटित सहकारी न्यायाधिकरण से है,
(फ) भूमि विकास बैंक का तात्पर्य ऐसे बैंक से है, जो उत्तर प्रदेश सहकारी भूमि विकास बैंक अधिनियम, 1964 की धारा 2 की उपधारा (ग) में परिभाषित है।