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विधि/निर्वाचन

सहकारी समितियों के निबन्धन की प्रक्रिया:-
उत्तर प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम 1965 के अधीन रहते हुए कोई भी समिति जिसका उद्देश्य सहकारी सिद्धान्तों के अनुसार अपने सदस्यों के आर्थिक हितों की उन्नति करना हो, इस अधिनियम के अन्तर्गत निबन्धित की जा सकती है, किन्तु इसके लिए कम से कम 10 व्यक्तियों का होना आश्यक है।
सहकारी समिति के निबन्धक के लिए सबसे पहले प्रस्तावित समिति की उपविधियों को बनाना पड़ता है।‍ जिसमें मुख्य रूप से समिति का उद्देश्य, कार्यक्षेत्र, सदस्यता का प्रकार, समिति मुख्यालय का पता आदि का विवरण दिया जाता है। यह भी आवश्यक है कि प्रस्तावित समिति की उपविधियां उत्तर प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम 1965 एवं उत्तर प्रदेश सहकारी समिति नियमावली 1968 के उपबन्धों के असंगत न हों।
सामान्य व्यक्तियों के लिए अधिनियम एवं नियमावली का ज्ञान न होने के कारण यह कार्य कठिन होता है। इस कठिनाई का निराकरण करने के लिए निबन्धक द्वारा कतिपय वर्गों की सहकारी समितियों की प्रतिमान उपविधियां बनाई गई हैं, जिसके आधार पर कतिपय संशोधनों के साथ प्रस्तावित समिति की उपविधियां आसानी से बनाई जा सकती हैं।
समिति के निबन्धन के लिए प्रार्थना-पत्र निबन्धक द्वारा इस प्रयोजन हेतु समय-समय पर निर्दिष्ट प्रपत्र में दिया जायेगा। यह प्रपत्र 50 रू० का शुल्क देने पर जिला सहायक निबन्धक कार्यालय से प्राप्त किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त जिला सहायक निबन्धक से 20/- प्रति की दर से प्रतिमान उपविधियों की चार प्रतियां प्राप्त की जा सकती हैं। इन प्रतिमान उपविधियों में प्रस्तावित समिति के उद्देश्यों आदि में यथाआवश्यक संशोधन कर प्रस्तावित समिति की उपविधियां बनाई जाती हैं।
निबन्धन हेतु निर्दिष्ट प्रपत्र पर प्रस्तावित समिति की उपविधियों की तीन प्रतियों को उचित रूप से भरकर जिला सहायक निबन्धक के माध्यम से सम्बन्धित क्षेत्रीय संयुक्त निबन्धक को निबन्धन हेतु भिजवाया जा सकता है अन्यथा सीधे अभिस्वीकृत डाक द्वारा अथवा व्यक्तिगत रूप से क्षेत्रीय संयुक्त निबन्धक को उपलब्ध कराया जा सकता है।
निबन्धन हेतु प्रस्तुत प्रार्थना-पत्र पर प्रथम हस्ताक्षरी वह व्यक्ति होगा, जिसने प्रार्थना-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्तियों के अनुमोदन से अन्तरिम अवधि के लिए सदस्य सचिव के रूप में कार्य करने का वचन दिया हो। प्रार्थना-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्तियों में से एक व्यक्ति मुख्य प्रवर्तक के रूप में भी हस्ताक्षर करेगा, जिसको निबन्धक निबन्धन के सम्बन्ध में सूचना देगा।
क्षेत्रीय संयुक्त निबन्धक का समिति के निबन्धन प्रार्थना-पत्र के साथ संलग्न आवश्यक प्रपत्रों का परिनिरीक्षण करने पर, और यदि आवश्यक हो तो जांच करने के पश्चात् यदि उसका समाधान हो जाय कि प्रस्तावित समिति निबन्धन हेतु सभी आवश्यक शर्तें पूर्ण करती है, प्रस्तावित समिति निबन्धित करेगा।

सहकारी समितियों की सामान्य निकाय एवं प्रबन्ध कमेटी के कर्तव्य एवं अधिकार :-
प्रत्येक सहकारी समिति की सर्वोच्च सत्ता समिति की सामान्य निकाय में निहित होती है। सामान्य निकाय समिति की सभी व्यक्तिगत सदस्यों एवं यदि अन्य समितियां इसकी सदस्य हैं, तो उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों से मिलकर बनती है। प्रत्येक समिति की सामान्य निकाय की बैठक प्रत्येक वर्ष होती है, जिसमें समिति के कार्यकलापों की समीक्षा होती है एवं अगले वर्ष के कार्यकलापों की योजना प्रस्तुत की जाती है। सामान्य निकाय के विगत् वर्ष के आडिट-शुदा संलग्न पत्र एवं आडिट आपत्तियों पर विचार-विमर्श किया जाता है।
समिति के कार्यकलापों से सम्बन्धित योजना बनाने, उनके क्रियान्वयन एवं समिति व्यवसाय से सम्बन्धित अन्य तात्कालिक निर्णय हेतु एक प्रबन्ध कमेटी होती है। इस प्रबन्ध कमेटी में संचालकों की संख्या अधिनियम, नियम में उपविधियों में निर्धारित संख्या के अनुसार होती है। प्रबन्ध कमेटी में एक सभापति एवं एक उपसभापति होता है। प्रबन्ध कमेटी का गठन सहकारी समिति अधिनियम एवं नियमावली के उपबन्धों के अधीन रहते हुए निर्धारित निर्वाचन प्रक्रिया द्वारा किया जाता है। निर्वाचित प्रबन्ध कमेटी का कार्यकाल दो वर्ष का होता है।
प्रबन्ध कमेटी के अधिकार एवं कर्तव्य ऐसे होंगे जो अधिनियम, नियम एवं उपविधियों के उपबन्धों के अधीन निर्धारित किये जायें। इन अधिकारों का प्रयोग प्रबन्ध कमेटी अपनी बैठक में बहुमत के आधार पर लिए गए निर्णय द्वारा ही करेगी।

सहकारी समिति की प्रबन्ध कमेटी के निर्वाचन की प्रक्रिया:-
सहकारी समितियों की प्रबन्ध कमेटी, सामान्य निकाय के गठन, अन्य समितियों की सामान्य निकाय के लिए प्रतिनिधियों आदि के निर्वाचन के लिए उत्तर प्रदेश सहकारी समिति नियमावली में निर्वाचन सम्बन्धी नियमों का समावेश किया गया है, जिसका विस्तृत विवरण नियम संख्या 439 से 444 में दिया गया है।
सहकारी समिति की प्रबन्ध कमेटी का कार्यकाल समाप्त होने के 15 दिन पूर्व नई प्रबन्ध कमेटी का निर्वाचन करा लिये जाने का प्राविधान अधिनियम में किया गया है। प्रबन्ध कमेटी के पुनर्गठन के लिए निर्वाचन, निबन्धक के अधीक्षण, नियन्त्रण और निर्देशों के अधीन विहित रीति से किये जाने की व्यवस्था है। इसके लिए निबन्धक द्वारा सहकारी समितियों के निर्वाचन की तिथियाँ निर्धारित की जाती हैं। निर्धारित निर्वाचन तिथियों से कम से कम 15 दिन पूर्व सहकारी समिति के निर्वाचन क्षेत्रों का अवधारण किया जाता है। निर्वाचन क्षेत्रों के अवधारण के लिए प्रारम्भिक सहकारी समितियों के लिए जिला सहायक निबन्धक में एवं केन्द्रीय सहकारी समितियों के लिए क्षेत्रीय संयुक्त निबन्धक में निबन्धक की शक्ति प्रतिनिधानित है। ऐसे प्रत्येक क्षेत्र से उतने प्रबन्ध कमेटी के सदस्य निर्वाचित किये जाते हैं, जितने कि क्षेत्र के अवधारण में निश्चित किये गये हैं। इस क्षेत्र निर्धारण में अनु० जाति/अन्य पिछड़ा वर्ग/महिलाओं आदि के लिए क्षेत्र का चिन्हांकन नियमों के उपबन्धों के अनुरूप किया जाता है।

सामान्य रूप से प्रत्येक प्रबन्ध कमेटी के निर्वाचन हेतु दो तिथियां निर्धारित की जाती हैं। पहली तिथि में प्रबन्ध कमेटी के सदस्यों का निर्वाचन होता है एवं इसके बाद वाली तिथि में सभापति, उपसभापति एवं अन्य समितियों के सामान्य निकाय हेतु प्रतिनिधियों के निर्वाचन कराये जाते हैं। निबन्धक द्वारा तिथियाँ निर्धारित कर देने के उपरान्त निर्वाचन से सम्बन्धित समस्त कार्रवाई उस जिले के जिलाधिकारी की, जहां सहकारी समिति का मुख्यालय स्थित है, की देख-रेख एवं नियन्त्रण में कराई जाती है। जिलाधिकारी इस कार्य के लिए निर्वाचन अधिकारी नियुक्त करता है एवं आवश्यकता पड़ने पर उसकी सहायता के लिए अन्य अधिकारियों को भी नियुक्त किया जाता है।
निर्वाचन अधिकारी निर्वाचन कार्यक्रम को समिति के सूचना पट एवं स्थानीय समाचान-पत्रों में प्रकाशित करवाता है। निर्वाचन से सम्बन्धित समस्त कार्रवाई यथा नाम- निर्देशन, नाम निर्देशन पर आपत्तियाँ प्राप्त करना, आपत्तियों का निस्तारण, वैध नाम निर्देशन पत्रों के अनुसार प्रत्याशियों को चुनाव चिन्ह आवंटन, मतदान कराना, मतपत्रों की गणना एवं विजयी उम्मीदवार की घोषणा आदि समस्त कार्य प्रकाशित निर्वाचन कार्यक्रम के अनुरूप निर्वाचन अधिकारी द्वारा सम्पादित किया जाता है।
प्रबन्ध कमेटी के सदस्यों के निर्वाचन के उपरान्त आगामी निर्वाचन तिथि में प्रबन्ध कमेटी के सभापति एवं उपसभापति का निर्वाचन कराकर नई प्रबन्ध कमेटी का गठन किया जाता है और यह नई प्रबन्ध कमेटी दो वर्षो तक कार्य करती है तथा उ0प्र0 सहकारी समिति (संशोधन) अधिनियम-2013 दिनांक 28-03-2013 द्वारा उ0प्र0 सहकारी समिति अधिनियम-1965 की धारा-29(7) में संशोधन करते हुए प्रशासक/प्रशासक कमेटी का कार्यकाल 5 वर्ष कर दिया गया है।

विवादों का निपटारा:-
सहकारी समिति के सदस्यों के ऐसे विवाद को, जो सहकारी समिति अधिनियम की धारा-70 के अन्तर्गत आते हैं, निपटाने के लिए सहकारी समिति अधिनियम की धारा-71 में व्यवस्था की गयी है। विवादों के निपटारे की इस व्यवस्था में न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखकर सहकारी समितियों के सदस्यों को स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक समाधान उपलब्ध होने से उन्हें अन्य न्यायालयों में जाने की आवश्यकता नहीं रह जाती है, जिससे उनके धन एवं समय की बचत होती है। ऐसे विवादों को सहकारी समिति के संगठन, प्रबन्ध अथवा कार्य के सम्बन्ध तक ही सीमित रखा गया हैं वेतनभोगी कर्मचारी के विरूद्ध की गयी अनुशासनिक कार्रवाई को उक्त विवाद की श्रेणी से अलग रखा गया है।
अधिनियम की धारा-70 के अन्तर्गत आने वाले विवादों में निर्वाचन से सम्बन्धित विवाद को छोड़कर प्राय: सभी विवाद निबन्धक को सन्दर्भित किये जाते हैं शीर्ष सहकारी समितियों के केस में निर्वाचन से सम्बन्धित विवाद भी निबन्धक स्तर से ही निस्तारित किये जोते हैं।
सामान्यत: सहकारी समितियों के सदस्यों एवं उसकी समिति के मध्य विवाद उत्पन्न होते हैं। यह विवाद प्राय: सम्पत्ति या धनराशि के दावे से सम्बन्धित होते हैं। इस प्रकार के विवाद को निपटाने के लिए सहकारी समिति नियमावली में सहकारिता विभाग के विभिन्न अधिकारियों को सम्पत्ति या धनराशि के मूल्य के आधर पर अधिकारिता क्षेत्र निर्धारित किये गये हैं। संक्षिप्त में विभिन्न अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र अधोलिखित रूप से परिभाषित किये गये हैं:-

सम्पत्ति से सम्बन्धित विवाद:-

  1. यदि विवाद में अन्तरग्रस्त सम्पत्ति का मूल्य या दावे की धनराशि 25,000.00 से अधिक नहीं है तो दावे से सम्बन्धित अभिदेश जिले के जिला सहायक निबन्धक को किये जायेंगे, जो उक्त वाद का निपटारा स्वयं कर सकता है अथवा अपने अधीनस्थ अन्तरग्रस्त सम्पत्ति का मूल्य 10,000.00 रू० तक की दशा में सहकारी निरीक्षक वर्ग-2 एवं अन्तरग्रस्त सम्पत्ति की सीमा रू० 10,000.00 से अधिक किन्तु रू० 25,000.00 तक होने की दशा में सहकारी निरीक्षक वर्ग-1 को मध्यस्थ नियुक्त कर सकता है।

  2. यदि विवाद में अन्तरग्रस्त सम्पत्ति का मूल्य या दावे की धनराशि 25,000.00 किन्तु 50,000.00 रू० से अधिक नहीं है तो दावे से सम्बन्धित अभिदेश मण्डल के उप निबन्धक या संयुक्त निबन्धक को किया जायेगा। उप निबन्धक या संयुक्त निबन्धक वाद का निपटारा स्वयं कर सकते हैं अथवा राज्य सरकार के श्रेणी 'ख' के किसी राजपत्रित अधिकारी को मध्यस्थ नियुक्त कर सकते हैं।

  3. यदि विवाद में अन्तरग्रस्त सम्पत्ति का मूल्य या दावे की धनराशि 50,000.00 से अधिक किन्तु 3,00,000.00 रू० से अधिक नहीं है तो दावे से सम्बन्धित अभिदेश मण्डल के क्षेत्राधिकारयुक्त अपर निबन्धक को किया जायेगा। अपर निबन्धक उक्त विवाद का निपटारा स्वयं कर सकता है अथवा श्रेणी 'क' के किसी राजपत्रित अधिकारी को मध्यस्थ नियुक्त कर सकता है।

  4. यदि विवाद में अन्तरग्रस्त सम्पत्ति का मूल्य या दावे की धनराशि रूपये 3,00,000.00 से अधिक है तो दावे से सम्बन्धित अभिदेश निबन्धक को किये जायेंगे। निबन्धक वाद का निपटारा स्वयं भी कर सकते हैं अथवा किसी अपर निबन्धक को मध्यस्थ नियुक्त कर सकते हैं।

निर्वाचन से सम्बन्धित विवाद:-

  1. यदि विवाद किसी सहकारी समिति की प्रबन्ध कमेटी, सभापति, उपसभापति एवं प्रतिनिधि के निर्वाचन से सम्बन्धित है तो उपरोक्त वाद सम्बन्धित जिला मजिस्ट्रेट को अभिदेश किया जायेगा। जो वाद का स्वयं निपटारा कर सकते हैं अथवा अपने अधीनस्थ किसी परगना मजिस्ट्रेट को मध्यस्थ नियुक्त कर सकते हैं।

प्रतिबन्ध यह है कि शीर्ष/एपेक्स सहकारी समिति के निर्वाचन से सम्बन्धित विवाद सहकारी समिति अधिनियम की धारा-3(1) के निबन्धक को अभिदेश किया जायेगा, जो वाद का स्वयं निपटारा कर सकता है अथवा अपने अधीनस्थ किसी अपर निबन्धक को मध्यस्थ नियुक्त कर सकता है।
 

   संशोधन-28-03-2013

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